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एबीवीपी अधिवेशनः संगठन मंत्री सुनील आंबेकर ने दिया 'मंत्र', घर-घर संपर्क-हर व्यक्ति से संपर्क

Sun, 24 Nov 2019 12:01 PM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
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एबीवीपी की पत्रिका राष्ट्रीय छात्रशक्ति की वेबसाइट की लॉन्चिंग करते पदाधिकारी - फोटो : अमर उजाला
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अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के राष्ट्रीय अधिवेशन में रविवार को संगठन मंत्री सुनील आंबेकर का भाषण सत्र हुआ।   राष्ट्रीय संगठन मंत्री सुनील आंबेकर ने भाषण सत्र में कहा कि हम अपने कार्यक्रमों में नवीनता ला सकते हैं, पर कार्यपद्धति को नहीं बदलना है।
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मानवीय संबंधों का कोई रिप्लेसमेंट नहीं होता। घर-घर संपर्क, हर व्यक्ति से संपर्क की व्यवस्था बनाए रखना होगा। हमारा स्वभाव स्वागत शील होना चाहिए। कार्यकर्ताओं की संख्या के साथ कार्य का विस्तार होना चाहिए।

रविवार को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की पत्रिका राष्ट्रीय छात्रशक्ति की वेबसाइट की लॉन्चिंग की गई। इस दौरान राष्ट्रीय संगठन मंत्री सुनील आम्बेकर, राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. एस सुबैय्या व राष्ट्रीय महामंत्री निधि त्रिपाठी मौजूद थे।
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इससे पहले शनिवार को हुए सत्रों में विभिन्न पदाधिकारियों ने भाषण दिए थे। भारत में जो विकास हुआ है, वह बाहर के लोगों ने नहीं बल्कि यहीं के लोगों ने किया है। रिसर्च में यह साबित हो चुका है।

पूरी दुनिया इस पर अपनी मोहर भी लगा चुकी है। हमारा डीएनएन हड़प्पा के लोगों जैसा ही है। हड़प्पा के लोग हमारे वंशज थे। यह कहना है पुरातत्वविद व डेक्कन डीम्ड यूनिवर्सिटी, पूना के कुलपति प्रो. बसंत शिंदे का। 

एबीवीपी के राष्ट्रीय अधिवेशन में सांयकालीन राष्ट्रीय एकात्मकता विषय पर अपने विचार रख रहे थे। उन्होंने कहा कि हम नया इतिहास नहीं लिख रहे लेकिन जो इतिहास बिगाड़ा है, उसे ठीक कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उन्होंने राखीगढ़ी, हरियाणा में खोदाई करके कई सवालों का जवाब तलाशा। इसमें पांच हजार साल पुरानी एक महिला के कंकाल के डीएनए का अध्ययन किया।

 
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इस अध्ययन से पता चला कि हड़प्पा कालीन जो लोग हैं, वह हमारे जैसे ही थे। काफी इतिहासकारों का मानना है कि भारत का शुरुआत से विकास करने वाले बाहर के थे। लेकिन हमने एक डीएनए से पता लगाया कि सभ्यता का विकास हम ही लोगों ने किया है।

कुछ लोगों का कहना था कि आर्य लोग बाहर से आए उन्होंने हमारी सभ्यता का विकास किया लेकिन ऐसा नहीं था। 12 हजार साल पहले जो शिकारी लोग थे वह दो ग्रुप में बंट गए थे। एक साउथ एशिया में रह गया था, दूसरा ग्रुप बाहर चला गया था।

हमारा डीएनए है वह साउथ एरिश में पैदा हुआ था। जोकि 12 हजार साल पहले पैदा हुआ था। यह डीएनए अभी भी मिल रहा है। हम सब लोग हड़प्पा लोग वंशों से मिलता है। उन्होंने कहा कि सरकार से अनुरोध है कि इस तरह के इतिहास को पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाए।
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