कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए जितना मास्क और सैनिटाइजर जरूरी है, उतनी ही विशेष दिनों में महिलाओं को निजी स्वच्छता की जरूरत होती है। सेनेटरी पैड न केवल आधी आबादी को बीमारियों से बचाता है, बल्कि उनको स्वच्छता का मरहम भी देता है। लॉकडाउन का असर महिलाओं की इस चीज पर भी पड़ा है।
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शहर में रिटेलर के पास इसकी कमी चल रही है। महिलाएं और छात्राएं शहर की दुकानों तक लॉकडाउन के कारण नहीं पहुंच पा रही हैं। गांवों में परचून और मेडिकल की छोटी दुकानों पर स्टॉक लगभग खत्म हो चुका है।
आशा कार्यकर्ता भी इसे बांट नहीं पा रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं इसकी कमी से जूझ रही हैं। क्वारंटीन सेंटर में भी इसे उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है। स्वास्थ्य महकमे और प्रशासन का ध्यान भी इस तरफ नहीं है। कुटीर उद्योग से जुड़कर नेपकिन तैयार करने वाली महिलाओं को लॉकडाउन में घर बैठना पड़ रहा है।
25 प्रतिशत मांग बढ़ी
लॉकडाउन में रिटेलर के पास पैड की कमी हो गई थी, हालांकि होल सेलर के पास पर्याप्त मात्रा में माल उपलब्ध है। बीते दो माह में इसकी 25 प्रतिशत मांग बढ़ी है। बाहर से माल आ नहीं पा रहा है। अब कोशिश की जा रही है कि सप्लाई में कोई कमी न आए। - पुनीत कालरा, मीडिया प्रभारी, आगरा फॉर्मा एसोसिएशन
कपड़े के पैड का ही प्रयोग किया
लॉकडाउन के दौरान नेपकिन नहीं मिलने से विशेष दिनों में बहुत परेशानी उठनी पड़ी। हमने दोबारा घर में बनाए हुए कपड़े के पैड का ही प्रयोग किया। - कोमल देवी, दहतौरा
तीन महीने से कोई नहीं आया
गांव में कई बार महिला संगठन के सदस्य जागरूक करने आते थे और पैड दे जाते थे। लॉकडाउन की वजह से तीन महीने से कोई नहीं आया। परेशानी हो रही है। - अर्चना देवी, दहतौरा
दुकान पर भी पैड उपलब्ध नहीं
लॉकडाउन के दौरान न तो कोई आशा या आंगनबाड़ी बहनजी आई और न ही कोई अन्य स्वास्थ्य कर्मी हमारे क्षेत्र में आया। घर के पास के केमिस्ट की दुकान पर भी पैड उपलब्ध नहीं है। - भावना नरवार, रामचंद्र पुरी
लॉकडाउन में घर बैठना पड़ा
महिला सुविधा कुटीर उद्योग में काम करने वाली मुन्नी देवी तथा गीता राजपूत ने बताया की लॉकडाउन की वजह से काम पर नहीं जा पाए। इससे घर का गुजारा करने में बहुत परेशानी हुई। सात मई से उद्योग दोबारा शुरू हो गया है। हम खुश हैं की इतने समय के बाद काम पर जा रहे हैं।
क्वारंटीन सेंटर में भी कमी
शहर में लगभग 20 क्वारंटीन सेंटर चल रहे हैं। इनमें महिलाओं के रहने के लिए अलग से कमरों की व्यवस्था की गई है। यहां रह चुकी आवास विकास कॉलोनी निवासी एक महिला ने फोन पर बताया कि वहां व्यवस्थाएं तो ठीक थीं, लेकिन सेनेटरी नेपकिन के लिए कोई इंतजाम नहीं है। प्रशासन को इस तरफ भी ध्यान देना चाहिए।
कच्चा माल बाहर से मंगाने में आ रही समस्या
महिला सुविधा फाउंडेशन की अध्यक्ष दिव्या मलिक ने बताया कि लॉकडाउन की शुरुआत में इसको आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी में नहीं दर्शाया गया है। जिसकी वजह से पैड बनाने वाली छोटी-बड़ी सभी इकाइयां बंद हो गईं। लेकिन अब राज्य सरकार ने इन्हें खोलने के लिए अनुमति दे दी है। लघु उद्योगों को कच्चा माल बाहर से मंगाने में परेशानी हो रही है।
आंकड़े पर एक नजर
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे 2018 के अनुसार भारत में लगभग 33.60 करोड़ माहवारी वाली महिलाएं हैं। इनमें से लगभग 42 प्रतिशत यानि 12.10 करोड़ महिलाएं ही सेनेटरी पैड का प्रयोग करती हैं। शेष 21.5 प्रतिशत महिलाएं आज भी पुराने कपड़े आदि का इस्तेमाल करती हैं।