प्रसिद्ध तीर्थनगरी सोरों में 152 साल पुराने मेले के आयोजन की परंपरा इस बार टूटने से पुरोहितों की भावनाएं आहत हैं। जहां एक ओर मेले को प्रांतीय मेले का दर्जा मिलने से वह खुश थे और उन्हें पहले साल काफी उम्मीदें थीं, वहीं अब वे मायूस हैं। कोरोना संक्रमण के चलते प्रशासन से अनुमति न मिलने के कारण पालिका और पुरोहितों की तैयारियां धरी रह गईं।
- मेरी उम्र 85 साल की है। जब से होश संभाला है तब से मेले का आयोजन देखते आ रहे हैं। हमें अभी तक ध्यान है जब हम छोटे थे तो हमारे परिवार के लोग बैलगाड़ियों से मेले में जाते थे और फिर वहां सात-सात दिन तक डेरा जमा लेते थे। वहीं रहकर दिन-रात मेले का लुत्फ उठाते थे। - हरीश चंद्र सिंह, लुहर्रा।
- मेले के वो पल हमें अभी तक याद हैं कि जब गांव में एक दिन पहले ही बुजुर्ग बुलावा लगवा देते थे। आवाज लगती थी चलो बालकों मेला में। कुछ ही लोगों पर बैलगाड़ियां होती थीं। सुबह ही बैलगाड़ियां सज जाती थीं। मेले में जाने के लिए पकवान भी बनते थे। अभी भी मेले का क्रेज कुछ कम नहीं है। - राधेश्याम, नगला दौली।
खाली है ग्राउंड न सर्कस, न साउंड
मार्गशीर्ष एकादशी से पहले हर साल जो मेला ग्राउंड पूरी तरह सज जाता था। साउंड का शोर शराबा सुनाई देता था, वहां अब पूरी तरह सन्नाटा छाया हुआ है। यहां मार्गशीर्ष मेले के मुख्य आकर्षण सर्कस, सिनेमा, मौत का कुआं, मैजिक शो, वैरायटी शो, थिएटर, ऊंचे झूले, अप्पू घर आदि खेल तमाशों के अलावा हर प्रकार के सामान की दुकानें सजती थीं। विभिन्न सरकारी विभागों की प्रदर्शनी व सम्मेलनों का आयोजन होता था, लेकिन इस बार रौनक गायब है।
निजी जगहों पर सजी दुकानें
मेला ग्राउंड में जगह किराए पर नहीं उठाई गई हैं, लेकिन उम्मीदें लेकर कुछ दुकानदार यहां आ गए हैं। कंबल, गर्म कपड़े, खिलौने, बक्से, ढोलक, खाजला आदि की दुकानें निजी जगहों पर सजी हुई हैं।