तरुण कुमार ने बताया कि उनके परिवार में छह सदस्य हैं और काफी समय से घरेलू गैस सिलिंडर बुक नहीं हो पा रहा है। परिवार का खाना बनाने के लिए उन्हें गोबर के कंडे लाने पड़ रहे हैं, ताकि घर का गुजारा चल सके। उन्होंने बताया कि उनके घर में मिट्टी के कुल्हड़ बनाने का काम भी होता है। कुल्हड़ों को पकाने के लिए भी आग की जरूरत पड़ती है, इसलिए गोबर के कंडे इस काम में भी इस्तेमाल हो रहे हैं। गैस न मिलने की स्थिति में एक ही आग से दो काम किए जा रहे हैं। एक तरफ परिवार का खाना बन रहा है और दूसरी तरफ कुल्हड़ भी पकाए जा रहे हैं।
तरुण कुमार के मुताबिक पहले गोबर के कंडे सस्ते मिल जाते थे और एक रुपये में दो कंडे मिल जाते थे, लेकिन गैस संकट बढ़ने के बाद कंडों की कीमत भी बढ़ गई है। अब एक कंडा एक रुपये में मिल रहा है। हाल ही में उन्होंने करीब 450 रुपये में लगभग 450 रुपये कंडे खरीदकर घर में रखे हैं, ताकि कुछ दिन तक चूल्हा और काम दोनों चल सकें। शहर में घरेलू गैस सिलिंडर की कमी के चलते कई लोग अब अपने स्तर पर इंतजाम कर रहे हैं। कोई लकड़ी तो कोई गोबर के कंडों का सहारा लेकर खाना बना रहा है। गैस संकट ने शहर के कई परिवारों को फिर से पारंपरिक चूल्हे की ओर लौटने पर मजबूर कर दिया है।