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बाल श्रम निरोधक दिवस: कहानी उन बच्चों की... जिनका बचपन गरीबी और मजबूरी ने छीन लिया

Sun, 13 Jun 2021 08:14 AM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा

सार

आगरा में श्रम विभाग ने तीन साल में 3120 ऐसे बच्चों को मुक्त कराया है, जो बाल मजदूरी करते थे। ज्यादातर बच्चों ने मजदूरी के पीछे अपनी कोई ना कोई मजबूरी बताई। 
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सांकेतिक तस्वीर
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विस्तार
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छोटी उम्र में और परिवार के लिए कमाने का बोझ। मजदूरी करने की मजबूरी ने बच्चों का बचपन छीन लिया। आगरा के कई मामलों में परिवार में कोई बड़ा नहीं है जो कमाकर ला सके तो कई मामलों अभिभावकों को बुरी लत के कारण बच्चों को मजदूरी करनी पड़ रही है। श्रम विभाग ने बीते तीन साल में 3120 बच्चों को मुक्त कराया।

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उप श्रमायुक्त धर्मेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि बीते साल विशेष अभियान चलाकर नौ वार्ड बालश्रम मुक्त कराए गए थे। अभियान में 93 बच्चे श्रम करते मिले। पूछताछ में अधिकांश बच्चों ने गरीबी और पिता की नशाखोरी की लत के कारण काम करने की मजबूरी बताई। इन बच्चों को स्कूलों में प्रवेश दिलाने के साथ अभिभावकों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाया। एएलसी पल्लवी अग्रवाल ने बताया कि यूनीसेफ के सहयोग से नया सवेरा योजना में वर्ष 2018-21 तक 3120 बच्चे श्रम मुक्त कराए। 

बाल श्रमिक विद्या योजना में 35 बच्चे चिह्नित
बाल श्रमिक विद्या योजना में 35 बच्चे चिह्नित किए। इनको पांच साल तक हर महीने आर्थिक सहायता मिलेगी। लड़की को 1200 रुपये और के को 1000 रुपये महीना दिया जाएगा। इनके मां-पिता को विभिन्न योजनाओं में पात्र होने पर लाभ दिया जाएगा।

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नौ साल में 280 बच्चे कराए श्रममुक्त: नरेश पारस
महफूज संस्था के प्रभारी नरेश पारस ने बताया कि वर्ष 2012-21 तक 280 बच्चों को दुकानों और प्रतिष्ठानों से श्रम से मुक्त कराया है। वे ढाबे, ऑटो रिपेयरिंग की दुकान, ढकेल, पंचर की दुकान समेत अन्य पर कार्य करते पाए गए। इनमें से 79 बच्चे भिक्षावृत्ति से जुड़े हुए थे।

केस- 1
...तीन भाइयों का खर्च उठाता हूं

बरहन निवासी 14 साल के किशोर के पिता की मौत हो गई है। दिसंबर में श्रम विभाग ने किशोर को रामनगर पुलिया स्थित एक दुकान से रेस्क्यू किया था। चाइल्ड लाइन सदस्य को काउंसिलिंग में बताया कि उसके पिता की मौत हो चुकी है। तीन छोटे भाई हैं। इस कारण चाचा के साथ आ गया था। 

केस- 2
खर्च चलाना हो रहा मुश्किल

बिहार का रहने वाला 14 साल का किशोर भी काफी समय पहले आगरा आया था। उसके पिता घर छोड़कर चले गए थे। तब से वह छोटे भाई की जिम्मेदारी संभाले हुए है। वह एक परिचित के साथ आ गया। इसके बाद एक दुकान पर काम करने लगा। काम नहीं करने की वजह से वह खर्च भी नहीं चला पाता है।
 
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‘पापा काम नहीं करते, मुझे काम करना पड़ रहा’
केस-3

रामबाग पर प्लेट धोने का कार्य करने वाले 12 साल के बच्चे ने बताया कि 50 रुपये और खाना-पीना मिल जाता है। मां घरों में साफ-सफाई करती है। पिता काम नहीं करते हैं, ऐसे में मुझे काम करना पड़ रहा है।

‘भाई और मैं 80 रुपये रोज पर काम करते हैं’
केस- 4

ईदगाह स्टैंड के पास गाड़ी सर्विस सेंटर पर गाड़ी की धुलाई करने वाले 13 साल के बच्चे ने बताया कि वह पढ़ना तो चाहता हूं, लेकिन घर चलाने के लिए काम करना पड़ता है। उसका एक भाई भी यहीं काम करता है। 80 रुपये रोज मिल जाते हैं।


यह आती हैं समस्याएं
- रेस्क्यू किए किए गए बच्चों के लिए पुनर्वास की व्यवस्था नहीं हो पाती है।
- आर्थिक संकट होने की वजह से बच्चे दोबारा काम करने लगते हैं।
- कई बार बच्चों को मां-बाप भी काम करने के लिए कहते हैं। इस वजह से वो मना नहीं कर पाते हैं।
रितु वर्मा, चाइल्ड लाइन समन्वय 
 
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