चतुर्वेदी समाज ने दिया था कृष्ण-बलराम का साथ
कंस वध के उपलक्ष्य में आयोजित होने वाले मेला की परंपरा प्राचीन है। इस परंपरा को उत्सव के रूप में शहर का चतुर्वेदी समाज सदियों से मनाते आ रहा है। यही धार्मिक परंपरा एक बार फिर शनिवार को शहर में निभाई जाएगी, जिसका उत्साह चतुर्वेदी समाज में घर-घर देखने को मिलेगा। समाज का दावा है कि जिस वक्त कृष्ण-बलराम कंस को मारने गए थे तो चतुर्वेदी समाज के पहलवानों ने साथ दिया था।
देश-विदेश से मथुरा आए चतुर्वेदी समाज के लोग
कंस मेला के लिए चतुर्वेदी समाज के लोग देश-विदेश से मथुरा में डेरा डाल चुके हैं। कोई मुंबई और बड़ौदा से आया है तो कोई दुबई से आकर इस आयोजन की प्रतीक्षा में है।
62 वर्षीय स्वतंत्रदेव चतुर्वेदी कंस मेला का इंतजार कर रहे हैं। वह बताते हैं कि दुबई जाने के बाद भी वे इस आयोजन में शामिल होने के लिए मथुरा आते हैं। यहां दिवाली भी अन्य परिजनों के साथ मनाने के बाद कंस मेला में शामिल होने के बाद वापसी करते हैं।
61 वर्षीय महेंद्र चतुर्वेदी मुंबई में रहते हैं, लेकिन कंस मेला के लिए वे पिछले 40 वर्षों से निरंतर मथुरा आते हैं। इन दिनों वे काफी समय पहले आ गए थे, लेकिन वापसी के लिए कंस मेला का इंतजार कर रहे हैं। वे कहते हैं कि रिटायर्ड होने के बाद भी उनका मेला के प्रति आकर्षण युवा अवस्था जैसा ही है।
क्या कहते हैं लोग
संस्कृत शिक्षक मुकेश चतुर्वेदी ने कहा कि कंस वध के बाद मथुरा के लोगों को यह विश्वास नहीं हो रहा था कि कंस मारा गया है। यहां के लोगों को यह विश्वास दिलाने के लिए कंस के मृत शरीर को घसीटकर किले से कंसखार तक लाया गया। किले से सामान भी लेकर लाए। इसमें छज्जू नामक चौबे ने खाट के पाये लोगों को दिखाए। जिसे देखकर मथुरावासियों ने इसका विश्वास किया।
द्वारिकेश संस्कृत विद्यालय के प्रधानाचार्य सहदेव कृष्ण चतुर्वेदी ने कहा कि चतुर्वेदी समाज के पहलवानों ने कंस वध के लिए भगवान श्रीकृष्ण और बलराम का साथ दिया था। उनके साथ गए थे। यही कारण है कि कंस वध के बाद चतुर्वेदी समाज इस उत्सव के रूप में मनाता आ रहा है। द्वारका बनने पर भगवान श्रीकृष्ण ने संपूर्ण मथुरावासियों को वहां पहुंचा दिया था, लेकिन चतुर्वेदी समाज को द्वारका में रहना पसंद नहीं आया ओर वे फिर मथुरा आ गए। इसके बाद फिर मथुरा को बसाया गया।