स्वतंत्रता संग्राम के दौरान आगरा के क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को लोहे के चने चबा दिए थे। स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं ने भी अहम योगदान दिया। दमन चक्र (1930) के विरोध में पारना गांव की विद्यावती राठौर घोडे़ पर चढ़कर गोरों की पलटन के सामने चट्टान की तरह खड़ी हो गईं थीं।
उनके तेवर देख दुश्मन सेना कांप गई। गिरफ्तारी तक मैदान में वो झुकी नहीं। तीन बार जेल जाने के बाद भी उनका जुनून कम नहीं हुआ था। अफसोस इस बात का है कि आजादी के बाद उन्होंने पारना के जिस किले पर शान से तिरंगा फहराया था, वो खंडहर में तब्दील हो गया है।
नमक सत्याग्रह (1930) के दौरान पारना गांव की विद्यावती के तेवर देख सत्याग्रही उन्हें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का अवतार मानने लगे थे। किरावली के सत्याग्रहियों पर अत्याचार का जवाब देने को वो क्रांतिकारियों के महिला दल के साथ गोरों की पलटन के सामने घोडे़ पर सवार होकर आ डटीं।