उनकी हार के पीछे जनसंघ के प्रत्याशी ए. प्रकाश रहे, जिन्होंने इस लड़ाई को त्रिकोणीय बना दिया। उन्हें 1447 वोट मिले थे। 122 वोटों की हार को भोगीलाल मिश्रा भुला न सके और दो साल बाद 1969 में हुए विधानसभा चुनाव में आगरा पश्चिम सीट से कांग्रेस के टिकट पर फिर लड़े। इस बार भारतीय क्रांति दल के हुकुम सिंह ने उन्हें 416 वोटों से हरा दिया।
भीष्म पितामह को झेलनी पड़ी 511 वोटों की हार
1969 में ही आगरा छावनी से जनसंघ नेता और भाजपा के भीष्म पितामह कहे जाने वाले राजकुमार सामा कांटे की लड़ाई में 511 वोटों से हार गए। उन्हें कांग्रेस के देवकीनंदन विभव ने हराया। कांटे की टक्कर में आगरा के 10 प्रत्याशी ऐसे हैं जो 500 वोटों के अंतर से लखनऊ में विधानसभा में बैठने के अपने ख्वाब को पूरा नहीं कर पाए हैं।
15 प्रत्याशी ऐसे रहे जो लगभग एक हजार वोटों की हार से जीतने से चूक गए। इनमें एत्मादपुर से घनश्याम प्रेमी, फतेहपुरसीकरी से चंपावती, आगरा ग्रामीण से करन सिंह काने, एत्मादपुर से रामखिलाड़ी वर्मा, खेरागढ़ से जगदीश चंद्र दीक्षित प्रमुख रूप से शामिल हैं।