महंगाई भी तोड़ रही कमर
40 साल से मूर्तियां बेच रहे प्रताप सिंह ने बताया कि महंगाई ने हालत खराब कर दी है। मूर्तियां बनाने में लगने वाला सामान जैसे मिट्टी, रद्दी, पेंट, गहने, सजावट का सामान और ट्रांसपोर्ट तक के किराए में लगभग दोगुना खर्च बढ़ गया है। पहले हमारे पास बंगाल के प्रसिद्ध कारीगर भी काम करते थे, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण सभी अपने गांव चले गए।
उठाना पड़ रहा नुकसान
कैंट रोड के मूर्ति विक्रेता कोमल सिंह का कहना है कि इस बार नवरात्रों में कारोबार पटरी पर आने की उम्मीद थी, लेकिन फायदे की जगह घाटा ही उठाना पड़ा। कोरोना के बाद काम शुरू करने के लिए लोन लिया था, इसकी किश्त भी जमा नहीं कर पा रहे हैं। वहीं घर का खर्च चलाना भी मुश्किल हो रहा है।
बड़ी मूर्तियों की नहीं हुई बिक्री
सुल्तानगंज की पुलिया पर दस साल से मां दुर्गा की मूर्तियां बेच रहे बंगाल के माणिक ने बताया कि इस बार नवरात्र पर जितनी बिक्री की उम्मीद थी वैसी नहीं हुई। बड़ी मूर्तियां किसी ने नहीं खरीदी। ज्यादातर छोटी मूर्तियां ही लोगों ने खरीदी। अब यह अगले साल ही उम्मीद है।
बंगाल के सोनागाछी की मिट्टी का जरूर होता प्रयोग
मूर्तियां बनाने में बंगाल के सोनागाछी की मिट्टी जरूर मिलाई जाती है। मान्यता है कि जब तक यहां की मिट्टी नहीं मिलाई जाती तब तक मूर्ति पूरी नहीं मानी जाती। वहीं मैनपुरी, इटावा, फिरोजाबाद, और टूंडला की खास चिक नी मिट्टी की भी मूर्तियां बनाई जाती हैं। मूर्ति में सजावट के लिए कलकत्ता से आए कपड़ों, गोटा, चुनरी, सलमा-सितारे, मोती का प्रयोग किया जाता है। लुहार गली और रावतपाड़ा का सामान भी माता को सजाने में करते हैं। अच्छी गुणवत्ता वाला पेंट किया जाता है।
मूर्तिकारों का कहना है कि सरकार को अपनी योजनाओं में हमारे काम को शामिल करना चाहिए। शहरों के नवीनीकरण में भागीदारी मिले, जिससे पर्यटकों को हमारी संस्कृति के बारे में पता चले। यह भारतीय विरासत है इसके लिए कौशल केंद्र खोलें जाएं ताकि इच्छुक लोग इसे सीख सकें।
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