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संतान का सुख भी अपने कमोऱ्ं के अनुसार ही मिलता है

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आगरा। दयालबाग शिक्षण संस्थान (डीईआई) में आयोजित नाट्य महोत्सव के दूसरे दिन मंगलवार को शिक्षा संकाय के छात्र-छात्राओं ने संस्कृत नाटक ‘कर्मस्य फलं’ का मंचन किया। नाटक के माध्यम से संदेश दिया गया कि व्यक्ति के कर्म से ही सुख और दुख मिलता है। संतान का सुख भी व्यक्ति को अपने कर्म ही देते हैं। वहीं, अभियांत्रिकी संकाय के छात्र-छात्राओं ने ‘मीडिया’ नाटक के माध्यम से जीवन की त्रासदी को प्रस्तुत किया।
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‘कर्मस्य फलं’ नाटक के माध्यम से महाराज चित्रकेतु की कथा का मंचन किया गया। नाटक में महाराज चित्रकेतु की पुत्र प्राप्ति की लालसा देखकर ऋ षि अंगिरस उन्हें समझाते हैं कि पुत्रहीन तथा पुत्रवान दोनों ही दुखी हैं, जो सुख है वह भी क्षणिक है। महाराज चित्रकेतु के बार-बार अनुनय-विनय करने पर ऋ षि अंगिरस ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद दिया। पुत्र जन्म के बाद महाराज प्रजा के प्रति अपने कर्तव्यों से विमुख होकर रात-दिन अपने पुत्र के साथ समय बिताने लगे। बाद में पुत्र की मृत्यु हो जाती है। पुत्र शोक में डूबे हुए महाराज को देव ऋ षि समझाते हैं कि पुत्र मोह महज मन का भ्रम है, सब कुछ बस परमात्मा ही है। माता-पिता अपने पुत्र-पुत्री को इस जन्म में सुसंस्कारी नहीं बनाते, अगले जन्म में उनके घर शत्रु पुत्र पैदा होते हैं।
अभियांत्रिकी संकाय के छात्र-छात्राओं ने ग्रीक नाटक ‘मीडिया’ में दर्शाया कि मीडिया अपने विश्वासघाती पति जेसन से बदला लेती है और नारीवादी दृष्टिकोण के नए प्रतिमान स्थापित करती है। नाट्य महोत्सव का संयोजन डॉ. सोनल सिंह, डॉ. दयाल प्यारी सिन्हा व डॉ. नंदिनी रघुवंशी ने किया। संचालन कला संकाय की छात्रा सदफ इस्त्यिाक और सुगंधा खेड़ा ने किया। कला संकाय के डॉ. प्रेम शंकर सिंह, डॉ. लवलीन मल्होत्रा, डॉ. नमिता भाटिया, डॉ. शोभा भारद्वाज, डॉ. पूजा, डॉ. रंजना पांडेय ने सहयोग दिया।
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