राजा महेंद्र प्रताप के देश प्रेम के थे कायल
1929 में गांधी का फिर मथुरा आगमन हुआ, तब वे रंगेश्वर स्थिति पुराने डाकघर में ठहरे थे, उसी समय मथुरा के अलावा, वृंदावन, गोकुल, महावन, कोसीकलां में जगह-जगह आजादी की जंग को लेकर सभाएं की थीं। मथुरा में गांधी ने त्यागमूर्ति, देश भक्त राजा महेंद्र प्रताप सिंह से मिले तो उन्होंने उनके प्रेम महाविद्यालय को देखकर कहा था- यह विद्यालय देखकर मन में अनेक विचार उत्पन्न हो रहे हैं, यहां ऐसी कोई चीज नहीं जो देखने लायक न हो, इसके संस्थापक को जितना भी धन्यवाद दिया जाए, थोड़ा है।
ब्रजभूमि में गायों की दशा देख हुए थे दुखी
एक बार गांधीजी अलीगढ़ मार्ग से कई स्थानों पर जनसभाएं करते हुए मथुरा पहुंचे तो, उन्हें श्रीकृष्ण की जन्मभूमि होने का कोई लक्षण न देख, उनको बड़ा दु:ख हुआ। उन्होंने मानपत्र के उत्तर में गोरक्षा पर अपना हृदय उड़ेल दिया। कहा कि यहां आने वाले असंख्य दर्शनार्थी इस अभिलाषा से आते हैं कि मथुरा गोपाल की जन्मभूमि है। लीला भूमि है।
यहां पर संसार की सर्वोत्तम गायें देखने को मिलेंगी, लेकिन मैं मथुरा की सड़कों से गुजरता हुआ देख रहा हूं कि गायों की हड्डियां बाहर निकल रही हैं, गायें इतना कम दूध देती हैं कि आर्थिक बोझ बन जाती हैं। इस पवित्र स्थान में मैंने बूचड़खाना भी देखा है। बालकृष्ण के प्रति उपासना का दंभ हम भरते हैं, उससे अच्छा है, अपने कर्तव्य का पालन करें।
साहित्यकार डॉ. अनीता चौधरी बताती हैं कि मथुरा को लेकर महात्मा गांधी से जुड़ीं अनेक घटनाओं का उल्लेख पुस्तकों में मिलता है। लेकिन कोई भी ऐसा स्थल प्रशासन उनकी स्मृति में तैयार नहीं कर सका जो यादगार बन सके। यहां तक कि पलवल रेलवे स्टेशन पर गांधी जी के गिरफ्तार करने की घटना का उल्लेख वहां आज भी मिलता है, लेकिन मथुरा पुलिस बैरक में रात भर गांधीजी के रहने की कोई स्मृति नहीं है।