कासगंज। खेती के कृत्रिम प्रयोग से जागे हौंसले ने उद्देश्य को मुकाम तक पहुंचा दिया। मचान विधि ने किसानों की तकदीर ही नहीं बदली बल्कि खेतीबाड़ी की तस्वीर भी बदल डाली है, यह विधि जहां एक ओर किसानों को आर्थिक समृद्ध बना रही है वहीं खेतों की माटी के लिए पर्याप्त पोषक तत्व भी दे रही है। जिले के सौ से अधिक किसान उद्यान विभाग के आंकड़ों में इस विधि से खेतीवाड़ी कर रहे हैं।
कभी एक समय था जब किसान मचान विधि का प्रयोग नहीं करते थे।
वे खेतों की माटी में क्यारी विधि से ही सब्जियां पैदा करते थे। जिससे फसलों में लागत की अपेक्षा उत्पादन बेहतर नहीं हो पाता था। अधिक लागत होती थी और मुनाफा कम होता था। ऐसे में उद्यान विभाग समय-समय पर किसानों को इस विधि से खेती के प्रति जागरूक करता रहा। नतीजा रहा कि अधिकांश किसान अब इस विधि से खेती करने में रुचि दिखाने लगे।
गांव मेमड़ी, लुहर्रा, धनतोरिया सहित तमाम गांव में वैसे तो काफी किसान इस विधि से खेती करने लगे हैं, लेकिन उद्यान विभाग के आंकड़ों में सौ किसान ऐसे हैं जो मचान विधि से बेहतर खेती को मुकाम दे रहे हैं। सरकारी आंकड़ों में वे होनहार किसानों की श्रेणी में शामिल हैं। सबसे अहम बात यह है कि इन किसानों में कई किसान ऐसे हैं जो उर्वरकों का प्रयोग इस खेती में नहीं कर रहे बल्कि जैविक खाद अपना रहे हैं।
सहफसली से दोहरा लाभ
मचान विधि से खेती करने से सहफसली भी की जा सकती है। ऐसा कई किसान कर भी रहे हैं। मेमड़ी के चंद्रभान इन दिनों करेले की फसल मचान विधि से कर रहे हैं, जबकि पिछले दिनों उन्होंने मचान विधि से लौकी, तोरई की फसल की थी और सहफसली के रूप में प्याज भी उगा ली। इनको उद्यान विभाग सम्मानित कर चुका है।
तब खराब हो जाती थीं क्यारी विधि से फसलें
एक समय था जब किसान क्यारी विधि से खेती पर निर्भर रहते थे तो उन्हें बारिश के मौसम में उन्हें नुकसान झेलना पड़ता था। क्योंकि करेला, तोरई, लौकी, खीरा आदि की फसलें बारिश के दौरान सड़ गल जाती थीं। क्योंकि यह फसलें जमीन पर होती थीं, लेकिन अब बारिश से इन फसलों को बचाया जा रहा है।
ऐसे बनता है मचान
विशेषज्ञों की मानें तो मचान के लिए लोहे का तार, प्लास्टिक की रस्सी और खूंटी की आवश्यकता होती है। एक एकड़ में लगभग 25 हजार रुपए मचान बनाने में खर्च आ जाता है, जबकि 20 हजार रुपये तक फसलों में लागत लग जाती है। मुनाफे की बात करें तो खर्चा निकालकर लगभग एक लाख रुपये अल्प समय में किसानों का मुनाफा हो जाता है।
मचान विधि से तोरई, लौकी, खीरा, करेला, सेम आदि की फसलें कम लागत में बेहतर पैदा की जा सकती है। जिले में सौ से अधिक किसान इस विधि से खेती कर रहे हैं और कम लागत में अधिक लाभ उठा रहे हैं। - योगेश कुमार, जिला उद्यान अधिकारी