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टिकट कटते ही बदल रही नेताओं की निष्ठा

Mon, 23 Jan 2017 01:01 AM IST
टिकट कटते ही बदल रही नेताओं की निष्ठा
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घोषणापत्र जारी करते अखिलेश-डिंपल यादव - फोटो : ANI
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एत्मादपुर से रालोद के उम्मीदवार बनाए गए प्रेम सिंह बघेल ने 24 घंटे पहले ही एलान कर दिया कि वह हैंडपंप के सिंबल पर चुनाव नहीं लड़ेंगे, क्योंकि  वह रालोद में कभी शामिल ही नहीं हुए, अभी भी सपा में हैं । हक्का-बक्का रालोद को उम्मीदवार बदलना पड़ा। कुछ ऐसी ही कहानी दक्षिण सीट पर सामने आई। नजीर अहमद को पहले सपा ने अपना उम्मीदवार घोषित किया। फिर कांग्रेस ने टिकट दे दिया। दोपहर तक उनका चुनाव चिन्ह साइकिल था। शाम को हाथ का पंजा हो गया।
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नामांकन की अंतिम तारीख नजदीक आते ही नेताओं की आस्था घंटों में बदल रही है। कुंदनिका शर्मा उत्तर से सपा की प्रत्याशी बनाई गई थीं, लेकिन नई सूची में उनका पत्ता साफ हो गया। बस फिर क्या था, छोड़ दी सपा और कूद पड़ीं निर्दलीय मैदान में। वह भाजपा छोड़कर सपा में आई थीं। इस सीट पर कांग्रेस का एक टिकट दावेदार रालोद के संपर्क में है।
ऐसा भी नहीं है कि दल-बदल सिर्फ टिकट के लिए हो रहा है। कोई टिकट न मिलने पर पाला बदल रहा है, तो ऐसे भी कम नहीं जो एक दल से उम्मीदवार बनाए जाने के बावजूद जीत की उम्मीद का बेहतर गणित देख दूसरे में जा रहे हैं। बाह के विधायक  अरिदमन सिंह को इसी सीट से और उनकी पत्नी पक्षालिका को खेरागढ़ से सपा का टिकट मिल गया था। इसके बाद भी वह भाजपा में चले गए।
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अरिदमन सिंह भाजपा ज्वाइन करने के चार दिन पहले तक कहते रहे कि उनके सपा छोड़ने का कोई सवाल ही नहीं उठता है। भाजपा में आते ही बोले, सपा में उनका दम घुट रहा था। पक्षालिका सिंह को भाजपा ने बाह से टिकट दिया है।
अमर सिंह परमार बीजेपी में थे, यहां टिकट की दाल नहीं गली तो सपा में पहुंच गए। ताल ऐसी बैठी कि खेरागढ़ से उम्मीदवार बन गए।  लेकिन किस्मत फिर दगा दे गई। गठबंधन हुआ तो सीट कांग्रेस के खाते में चली गई और उनके अरमानों पर पानी फिर गया। 
24 जनवरी को नामांकन की आखिरी तारीख है। आज और कल में दल-बदल का खेल और तेज होगा। टिकट न मिलने से नाराज कई नेता बागी बन चुके हैं। अगर उनके गिले शिकवे दूर न किए तो पाला बदल सकते हैं।
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