संभागीय परिवहन कार्यालय (आरटीओ) के बाहर स्थित दलाल दिव्यांगों को ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने का झांसा देकर ठगी कर रहे हैं। दिव्यांगों की लर्निंग की फीस 350 रुपये जमा हो जाती है। जब वह टेस्ट देने के लिए कार्यालय में पहुंचते हैं तब उनकी लाइसेंस प्रक्रिया को रोक दिया जाता है। एक माह के भीतर आरटीओ पहुंची 53 दिव्यांगों की फाइलों को रोक लिया गया है।
ट्रैफिक का जुर्माना बढ़ने के साथ ही आरटीओ में ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने वालों की संख्या में दोगुना इजाफा हो चुका है। प्रतिदिन 350 प्रशिक्षु और 200 स्थायी लाइसेंस बनाए जा रहे हैं।
शनिवार को आवेदन करने वालों को 12 दिसंबर की वेटिंग मिली है। अब दिव्यांग भी अपने ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के लिए पहुंचने लगे हैं। वह आरटीओ के सामने बैठे दलालों के पास जाकर लाइसेंस बनवाने की कहते हैं तो दलाल उन्हें मना नहीं करते हैं।
चूंकि आवेदन ऑनलाइन करना होता है, इसलिए उनका आवेदन भरकर बायोमेट्रिक और कंप्यूटर टेस्ट के लिए आरटीओ के लाइसेंस पटल में भेज दिया जाता है। जब दिव्यांग बायोमेट्रिक या कंप्यूटर टेस्ट के लिए पहुंचते हैं तो लाइसेंस पटल के कर्मचारी उनकी दिव्यांगता को देखकर मेडिकल सर्टिफिकेट मांगते हैं।
40 फीसदी तक दिव्यांगता होने पर लाइसेंस नहीं बनाए जा सकते हैं। उन्हें आटोमेटिक व्हीकल का विकल्प दिया जाता है। 15 सितंबर से 15 अक्तूबर के बीच 53 ऐसे लोगों ने आवेदन किए, जोकि आंख, कान और शरीर से दिव्यांग हैं। इनकी फाइलों को रोक लिया गया है।
दिव्यांग अधिकारी से लें जानकारी
दिव्यांगता के कारण 53 आवेदनों को एक माह के भीतर रोका गया है। दो ऐसे भी लोग थे, जिनके पूर्व में लाइसेंस बन चुके थे, लेकिन बाद में हादसों में वह दिव्यांग हो गए। उनके लाइसेंस भी नवीनीकृत नहीं हो सकते हैं। ऐसे में दिव्यांग व्यक्ति को पहले कार्यालय में अधिकारी से संपर्क करना चाहिए, ताकि वह धोखाधड़ी से बच सकें। -सुधीर वर्मा, प्राविधिक निरीक्षक (तकनीकी)
शारीरिक क्षमता के आधार पर ही दी जाती है रिपोर्ट
लाइसेंस के आवेदन करने वाले दिव्यांग जब मेडिकल के लिए पहुंचते हैं तो हम शारीरिक क्षमता के आधार पर इनका टेस्ट करते हैं। आंखों, कान या हाथ-पैर में विकलांगता ज्यादा होने की स्थिति में आवेदन को निरस्त किया जाता है। -डॉ. अंशुल पारीक, चिकित्सक, जिला अस्पताल