आगरा में हादसों और स्वास्थ्य संबंधी आपात स्थिति में ग्रीन कॉरिडोर बनाने की बातें कई बार हो चुकी हैं, लेकिन यह आज तक नहीं बन सका है। फतेहपुर सीकरी में रेलिंग से गिरकर घायल पर्यटक को दो घंटे बाद अस्पताल पहुंचाया जा सका। 25 मिनट बाद चिकित्सक ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। हादसे के बाद यही कहा जा रहा है कि गोल्डन आवर में घायल अस्पताल पहुंच जातीं तो शायद सांसें रुकने से बचाई जा सकती थीं। यह हाल तब है, जब आगरा में 108 एंबुलेंस की सेवा से लेकर स्मारकों के पास पर्यटन-टूरिज्म पुलिस भी तैनात रहती है।
किसी तरह की गंभीर चोट या स्वास्थ्य संबंधी आपातकाल में मरीज के लिए गोल्डन आवर का एक घंटा महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान मरीज के अस्पताल पहुंचने पर जान बचाई जा सकती है। दिल्ली सहित कई शहरों में मरीजों के लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाया जा चुका है। स्वास्थ्य विभाग ही नहीं, पुलिस-प्रशासन की टीम मिलकर एंबुलेंस को रास्ता देती है।
मगर, फ्रांस की पर्यटक के मामले में ऐसा नहीं हुआ। पर्यटक 12:45 बजे गिरकर घायल हुई थीं। एक घंटे तक पर्यटक एंबुलेंस का इंतजार करते रहे। 1:45 बजे एंबुलेंस पहुंची भी। मगर, उसे सिकंदरा स्थित अस्पताल में पहुंचने में दो घंटे यानि दोपहर 3:45 बजे लग गए। यह अंतर बहुत ज्यादा था।
क्या है गोल्डन आवर
किसी हादसे में गंभीर चोट लगने के बाद पहला एक घंटा बेहद महत्वपूर्ण होता है, जिसमें सही इलाज और प्रबंधन से मरीज की जान बच सकती है। शरीर के अंग भी खराब होने से बचाए जा सकते हैं।
स्मार्ट व सेफ सिटी में यह हाल
आगरा को स्मार्ट और सेफ सिटी बनाने की बातें तो बहुत हो रही हैं। पर्यटकों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने के दावे किए जा रहे हैं। ऑपरेशन टूरिस्ट डिलाइट भी चलाया जा रहा है। मगर, आम आदमी ही नहीं, पर्यटक तक को आपात स्थिति में सहायता नहीं मिल पा रही है।
आगरा में जाम और अतिक्रमण
वरिष्ठ अधिवक्ता केसी जैन ने बताया कि ग्रीन कॉरिडोर की आवश्यकता आपात स्थिति में की जाती है। आगरा की बात करें तो यहां ग्रीन कॉरिडोर बनाना आसान नहीं हो सकता है। सड़कों पर जाम और अतिक्रमण से पहले ही जाम रहता है। अगर, पुलिस ग्रीन कॉरिडोर बनाएगी भी तो काफी देर लग जाएगी। पुलिस के पास पहले से कोई एसओपी नहीं है, जिससे की ग्रीन कॉरिडोर बनाने पर ट्रैफिक डायवर्जन किया जा सके।
काई बार हुआ ट्रायल
पुलिस आयुक्त डॉ. प्रीतिंदर सिंह ने बताया कि आगरा में आपात स्थित के लिए ग्रीन कॉरिडोर का कई बार ट्रायल हो चुका है। समय पर सूचना मिलने पर इसकी व्यवस्था की जाती है। इसके लिए पुलिसकर्मियों को लगातार बताया जाता रहता है।
ग्रीन कॉरिडोर में क्या
ग्रीन कॉरिडोर तब बनाया जाता है, जब वीवीआईपी मूवमेंट होता है या फिर किसी मरीज को एक जगह से दूसरे जगह के अस्पताल ले जाया जाता है। इस दौरान पुलिस रास्ता रोक देती है। उस रूट को खाली करा लिया जाता है, जिस पर एंबुलेंस और वीवीआईपी वाहन निकल रहा होता है। वाहनों को रूट डायवर्ट करके निकाला जाता है। जगह-जगह चौराहों पर पुलिस तैनात कर दी जाती है।