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कोरोना काल में बदली नेत्रहीनों की जिंदगी, सुनकर और आवाज देकर पूरी कर रहे स्पर्श की कमी

Sat, 05 Sep 2020 02:23 PM IST
मुकेश कुमार नेहा सिंह, अमर उजाला, आगरा

सार

  • महामारी के कारण नेत्रहीनों की दिनचर्या में आया बड़ा बदलाव
  • घर से नहीं निकलते, ऑनलाइन निबटाते हैं अधिकांश काम
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नेत्रहीनों की दिनचर्या में आया बड़ा बदलाव - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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कोरोना महामारी से सभी की दिनचर्या बदली है। नेत्रहीनों के लिए यह बदलाव अधिक बड़ा है। आंखों की रोशनी के अभाव में स्पर्श से चीजों को पहचानते हैं, लेकिन कोरोना काल में स्पर्श की मनाही है। ऐसे में उनके सामने तमाम चुनौतियां आ रही हैं। किसी ने घर से अकेले बाहर जाना बंद कर दिया है तो कोई ऑनलाइन कार्यालय के काम निपटा रहा है। किसी ने दोस्तों से दूरी बना ली है तो कोई सहयोगी लेकर चल रहा है। सतर्कता भी बढ़ाई है, सुनकर और आवाज देकर स्पर्श की कमी को पूरा कर रहे हैं। 

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'ऑनलाइन निपटाता हूं अधिकांश काम'


पर्यटन सूचना अधिकारी रवि दिनकर बताते हैं कि एहतियात बरत रहा हूं। अधिकांश चीजों के बारे में छूकर ही जानकारी लेते हैं। कोरोना काल में यह संक्रमण का बड़ा कारण है। हमें खतरा अन्य लोगों की अपेक्षा ज्यादा है। बाहर आना-जाना कम कर दिया है। कार्यालय के अधिकांश काम ऑनलाइन निपटाता हूं। बहुत ज्यादा जरूरी होने पर ही घर से बाहर निकलता हूं। हर समय सैनिटाइजर अपने पास रखता हूं। जिस भी चीज को हाथ लगाता हूं, पहले उसे सैनिटाइज करता हूं। 

लोगों के बीच उठना-बैठना हुआ कम

शिक्षिका आरिफा शबनम ने बताया कि कोरोना से बचाव के लिए गलब्स, मास्क का प्रयोग कर रही हूं। समय-समय पर अपनी छड़ी को भी सैनिटाइज जरूर करती हूं, क्योंकि बाहर जाने के लिए इसका इस्तेमाल सबसे ज्यादा किया जाता है। अन्य इंद्रियों का प्रयोग करके लोगों से उचित दूरी बनाकर रखती हूं। पहले की अपेक्षा दिनचर्या में बहुत बदलाव आया है। लोगों के बीच उठना-बैठना बहुत कम कर दिया है। अकेले कहीं बाहर नहीं जाती हूं। 

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'पहचान की जगहों पर ही जाता हूं'

छात्र मोहम्मद रफी ने कहा कि दोस्तों से फिलहाल दूरी बना ली है। कम ही मिलता-जुलता हूं। आस-पास की जगहों पर ही जाता हूं, जहां के रास्ते पहचाने हुए हैं। आहट से लोगों को जानकर सामाजिक दूरी बना लेता हूं। मास्क का ध्यान रखता हूं, सैनिटाइजर साथ रखता हूं। किसी चीज से हाथ का स्पर्श हो जाए तो तुरंत सैनिटाइज करता हूं। जल्द ही परीक्षा होने वाली है। तब परिवार के किसी व्यक्ति को साथ रखूंगा। 

'आवाज से पूरी करता हूं स्पर्श की कमी'

संगीत शिक्षक रोहित ने कहा कि कदमों की आहट से आस-पास के लोगों का अंदाजा लगा लेता हूं। सामाजिक दूरी का पालन करने के लिए यही तजुर्बा काम आ रहा है। स्पर्श करने की बजाए आवाज से चीजों को महसूस करने की कोशिश रहता हूं। बाहर निकलने पर पिता साथ जाते हैं। सामान्य लोगों की तरह ही मैं भी गाइड लाइन का पालन करता हूं। बच्चों को संगीत सिखाना शुरू कर दिया है। बाहर प्रस्तुति देने की बजाए अब यू-ट्यूब पर वीडियो अपलोड कर रहा हूं।
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