शैलेंद्र अग्रवाल जालसाजी केस में दाखिल की गई चार्जशीट जांच में किए गए खेल की पूरी कहानी बयां कर रही है। एक तो पुलिस ने जालसाज को राहत देने के लिए दो संगीन धाराएं हटा लीं। दूसरा शक के घेरे में आए अफसरों को बचाने के लिए एसएमएस की डिटेल कोर्ट से छुपा ली गई। जबकि इन्हें सीबीआई की टेक्निकल विंग से डिकोड कराया गया था। अगर यह ब्योरा कोर्ट के सामने पहुंच जाता तो प्रमोशन-पोस्टिंग की बोली लगाने वाले अफसरों का बचना मुश्किल था।
पांच मई से जेल में बंद शैलेंद्र के घर से बरामद तीन मोबाइल और चार पांच हार्ड डिस्क की जांच पहले साइबर सेल से कराई गई थी और फिर सीबीआई की टेक्निकल विंग से। एसएमएस डिकोड होने से ही दरोगाओं की ट्रांसफर-पोस्टिंग की बोली लगाए जाने का खुलासा हुआ था। एक तत्कालीन डीजीपी ने पोस्टिंग का रेट सात लाख तय किया था। दूसरे ने प्रमोशन का 20 लाख। इनके अलावा आगरा का डीएम रहा एक अफसर कोड में शैलेंद्र को एसएमएस भेजता था। कभी 50 शर्ट मंगाता था, कभी मिठाई तो कभी मुर्गा। पुलिस इन्हें घूसखोरी के कोड मान रही थी। लेकिन चार्जशीट में एक भी एसएमएस की डिटेल नहीं।
सिर्फ यह बताया गया है कि उसके एक आईफोन से 806 एसएमएस मिले और दूसरे से 922। तीसरे के बारे में रिपोर्ट है कि इसमें सिर्फ पारिवारिक और स्कूल के अलावा कोई उल्लेखनीय एसएमएस नहीं है।
जांच का बहाना बनाया
जब पुलिस ने सीबीआई से एसएमएस डिकोड करा लिए तो फिर साइबर सेल से जांच कराने का क्या मतलब रह गया? शायद यह डर रहा कि कहीं एसएमएस डिटेल छुपाने पर कोर्ट कोई सवाल न पूछ ले। इससे बचने के लिए साइबर सेल को लिखा गया एक खत चार्जशीट में दिया गया है। इसमें एसएमएस की जांच फिर से करने के लिए कहा गया है।