एटा। जिले के बेसिक शिक्षा विभाग से संबद्ध प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय में ड्रेस वितरण के नाम पर फिर कमीशनखोरी का खेल शुरू हो गया है। शासन ने स्कूलों को 300 रुपये में सिलवाकर ड्रेस बांटने के निर्देश दिए हैं, लेकिन जिले में 250 में रेडीमेड ड्रेस खरीदकर बांटी जा रही है। अधिकारियों की शह पर ठेकेदार पूरे खेल को अंजाम दे रहे हैं।
नए वित्तीय वर्ष 2019-20 में शासन ने नि:शुल्क ड्रेस की गुणवत्ता तय करने के लिए राशि में इजाफा किया है। पिछले साल तक 200 रुपये प्रति ड्रेस जगह इस बार 300 रुपये में ड्रेस बांटने के निर्देश दिए थे। स्कूल की प्रबंध समिति को सिलवाकर हर बच्चे को दो सेट देना है। मगर जिले के अधिकारियों ने इसमें कमीशनखोरी शुरू कर दी है। जिले के हर ब्लॉक में ठेकेदार तय कर दिए गए हैं। जिनके जरिए स्कूलों में रेडीमेड ड्रेस पहुंचाई जा रही है। ठेकेदार 250 रुपये में ड्रेस दे रहे हैं। साथ ही अधिकारी स्कूलों में पहुंचकर रेडीमेड ड्रेस का वितरण कर शासन को गुमराह कर रहे हैं। ऐसे में एक बार फिर नि:शुल्क यूनिफार्म वितरण मजाक बन गया है।
ऐसे चलता है खेल
ठेकेदारों ने शिक्षा विभाग के अधिकारियों से सांठ-गांठ कर ली है। अधिकारी जिन स्कूलों में ड्रेस नहीं पहुंचती है, वहां की रिपोर्ट ठेकेदार को देते हैं। इसके बाद स्कूल के प्रधानाध्यापक को ठेकेदार से ड्रेस लेने के लिए कहा जाता है। नाम न छापने की शर्त पर एक प्रधानाध्यापक ने बताया कि अगर ठेकेदार से ड्रेस न लो तो निरीक्षण के नाम पर परेशान किया जाता है। बैठकों में भी शिक्षकों पर दबाव बनाया जाता है।
बदल-बदलकर दौड़ती है गाड़ियां
ठेकेदार जिले के ब्लॉकों में गाड़ियां बदल-बदलकर दौड़ते हैं। गाड़ियों में ड्रेस भरकर स्कूलों में जबरन दे दी जाती हैं। हर रूट के लिए अलग गाड़ी का इंतजाम होता है।
स्वयं सहायता समूह के आदेश नदारद
जिले में पिछले साल स्वयं सहायता समूह से ड्रेस सिलवाकर वितरित कराई गई थीं। लेकिन इस बार स्वयं सहायता समूहों को किनारे कर दिया गया है। ताकि कमीशनखोरी ठीक हो सके।
ये हैं शासन के निर्देश
शासन की अपर प्रमुख सचिव रेणुका कुमार ने पिछले दिनों निर्देश जारी किए थे। जिसमें उन्होंने कहा था कि कोई भी अधिकारी शिक्षकों पर ड्रेस खरीदने के लिए दबाव नहीं बनाएगा, लेकिन जिले में निर्देश ताक पर हैं।
ये है कपड़े का मानक
शासन ने गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कपड़े का मानक बदला है। इस बार 67 फीसदी कॉटन और 33 फीसदी पॉलिस्टर वाला कपड़ा मान्य किया गया है।
फोटो खिंचाकर कोरम पूरा
जिले के तमाम विद्यालयों में ड्रेस वितरण पूरा दिखा दिया गया है, लेकिन अब तक किसी भी स्कूल में आपूर्ति पूरी नहीं हुई है। कपड़े की आपूर्ति नहीं होने से 15-20 ड्रेस बांटकर फोटो खिंचाकर कोरम पूरा किया जा रहा है। विभाग के बड़े अधिकारी भी इसे लेकर मौन हैं।
कहते हैं आंकड़े
1800 से अधिक बेसिक स्कूल हैं जिले में
300 रुपये प्रति ड्रेस करना है खर्च
250 रुपये में बांटी जा रही ड्रेस