150 रुपये एमआरपी, 1000 रुपये तक बेचे
औषधि निरीक्षक नवनीत कुमार यादव ने बताया कि कोडीन सिरप को 20-30 साल पहले खांसी के लिए डॉक्टर मरीजों को दूसरी शीशी में घोल बनाकर देते थे। कफ सिरप आने पर डॉक्टरों ने इसका चलन बंद कर दिया। ऐसे में नशे के लिए इसकी कालाबाजारी होने लगी। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, झारखंड, पंजाब, हरियाणा में नेटवर्क बनने के बाद बांग्लादेश-नेपाल तक कालाबाजारी से 10 गुना तक मांग बढ़ गई। इससे 150 रुपये एमआरपी वाले सिरप को 800-1000 रुपये तक बेचने लगे।
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