चुनाव में हार जीत तो होती ही है। लेकिन 1977 के चुनाव में जो कुछ हुआ वो हैरान कर देने वाला है। अमर उजाला के पुराने पन्नों से ये खबर मिली, जिसमें उस समय कांग्रेस द्वारा चुनाव जीतने के लिए किस कदर हदों को पार किया गया, इसकी जानकारी मिलती है।
दरअसल सत्ता परिवर्तन के बाद विपक्ष के कार्यों की जांच राजनीति का हिस्सा बन गई है। इमरजेंसी में हुई ज्यादतियों को लेकर लोगों में आक्रोश था। 1977 में हुए चुनाव में जनता के गुस्से के कारण स्वतंत्रता के बाद लगातार सत्ता में रही कांग्रेस सरकार को पराजय का मुंह देखना पड़ा। पहली बार बनी गैर कांग्रेस सरकार ने कांग्रेस सरकार के कार्यों की जांच शुरू कर दी।
इंदिरा गांधी पर तानाशाही तरीके से काम करने के आरोप लगे थे। ऐसे आरोप चुनाव के दौरान भी थे। चुनाव के दौरान भ्रष्ट तरीके अपनाने और सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग के आरोप भी थे। अमर उजाला के अंक में 27 अक्टूबर 1977 में प्रकाशित समाचार के अनुसार सरकार ने चुनाव मशीनरी के दुरुपयोग को लेकर यूपी कांग्रेस को नीलामी का नोटिस भेजा था।
उत्तर प्रदेश की जनता पार्टी सरकार में उस समय वित्त मंत्री मधुकर दिधे थे। सरकरा ने नोटिस में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर चुनाव के दौरान सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप लगाया था। नोटिस में कहा गया था कि इंदिरा गांधी के चुनाव दौरे के वक्त सरकारी धन का इस्तेमाल किया गया। उनके दौरे पर शासन ने 5 लाख 28 हजार रुपये खर्च किए थे। जनता पार्टी सरकार ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस को नोटिस भेज कर कहा था कि वह इस राशि को तुरंत अदा करें। अगर उत्तर प्रदेश कांग्रेस ऐसा नहीं करती है तो उसकी संपत्ति नीलाम कर दी जाएगी।
संजय गांधी पर भी आरोप
इमरजेंसी के दौरान कांग्रेस सरकार में संजय गांधी की तूती बोलती थी। उन पर नियमों का उल्लंघन कर मनमाने ढ़ंग से काम करने के भी आरोप थे। मधुकर दिधे के अनुसार जनवरी 1976 से चुनाव तक संजय गांधी के दौरे पर 20 लाख रुपये खर्च हुए थे।