यमुना नदी को जहरीला बना रहे मंटोला नाले से गिरता सीवर और औद्योगिक रसायन।
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आगरा। यमुना में दिल्ली से आगरा के बीच 80 फीसदी से ज्यादा प्रदूषण शहरों ने घोला है। नालों के जरिये यमुना में जहर पहुंच रहा है, जिसे रोका जाए। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट से शोधित पानी भी यमुना और इसकी सहायक नदियों में न छोड़ा जाए। यह जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में आगरा के पर्यावरणविद और सर्जन डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ ने दायर की है।
मामले में 27 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश समेत तीन जजों की बेंच इस जनहित याचिका की सुनवाई करेगी। डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ ने जनहित याचिका में मांग की है कि भविष्य में विकसित होने वाली नई नगर बस्तियों और औद्योगिक क्षेत्रों के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) और एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) से शोधित पानी भी नदियों या उनकी सहायक नदियों में न छोड़ा जाए। इसके बजाय इसका इस्तेमाल पार्कों, खेती, वनों के विकास और औद्योगिक कार्यों में किया जाए।
यमुना नदी की सफाई के नाम पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए लेकिन इसमें प्रदूषण की मात्रा बढ़ी है। करीब 80 फीसदी प्रदूषण दिल्ली से आगरा के बीच में घरेलू सीवेज और औद्योगिक रसायनों का है। हजारों करोड़ रुपये खर्च कर लगाए गए ट्रीटमेंट प्लांट से भी पानी की गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार नहीं हो रहा है। ऐसे में केवल प्रदूषण होने के बाद सफाई करने के बजाय नए शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों में अपशिष्ट जल के निस्तारण की व्यवस्था पहले से बदलने की जरूरत है। उन्होंने जल संसाधन संबंधी संसदीय स्थायी समिति की 29 फरवरी, 2024 की रिपोर्ट का हवाला दिया।
ताज के पीछे गंदे नाले में बदल गई यमुना
याचिका में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में विचाराधीन मामले में दिए गए यमुना के प्रदूषण का ब्योरा पेश किया गया है। इसमें सीवेज शोधन संयंत्रों के पानी में निर्धारित मानकों से अधिक प्रदूषक तत्व पाने की बात सामने आई थी। याचिका में कहा गया है कि यमुना नदी में प्रदूषण बढ़ रहा है। यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण क्षेत्र में प्रस्तावित नए शहरी केंद्रों और उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में विकसित होने वाली नई आवासीय टाउनशिप के अपशिष्ट जल का निस्तारण नदी में न किया जाए।