अयोध्या शोध संस्थान, संस्कृति विभाग की ओर से रामायण विश्वमहाकोश का निर्माण कराने जा रहा है। जो कि भावी पीढ़ी के लिए एक प्रमाणिक दस्तावेज होगा। इसके लिए केंद्रीय हिंदी संस्थान के अंतरराष्ट्रीय हिंदी शिक्षण विभागाध्यक्ष प्रो. उमापति दीक्षित को समन्वयक नामित किया गया है। उनसे सुझाव मांगे गए हैं। मुख्यमंत्री इस शोध संस्थान के अध्यक्ष हैं।
प्रो. उमापति दीक्षित को अयोध्या शोध संस्थान के निदेशक डॉ. योगेंद्र प्रताप सिंह का पत्र मंगलवार को प्राप्त हुआ। उन्होंने बताया है कि रामायण विश्वमहाकोश का प्रकाशन एक बहुत बड़ी परियोजना है।
इसमें अयोध्या से लेकर विश्व के प्रत्येक देश, क्षेत्र और ग्रामीण अंचल तक मूर्त व अमूर्त विरासत और कलाओं में रामायण के विस्तार को समाहित किया जाना है। रामायण की विश्व व्यापकता पर सभी एक मत हैं। अधिकांश इस बात से सहमत हैं कि रामायण विश्व के प्रत्येक देश और क्षेत्र में फैली हुई है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तथ्यों को जुटाना और उसका प्रकाशन एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।
स्थापत्य मूर्त कलाओं के साथ अमूर्त कलाओं के विविध स्वरूपों में और उनकी रामायण के अंकन, चित्रांकलन और फिल्मांकन इसलिए जरूरी है कि इसको एक ऐसा दस्तावेज बनाना है।
इससे वैश्विक स्तर पर अयोध्या, उत्तर प्रदेश और देश को सांस्कृतिक रूप से मजबूत बनाने का आधार बनेगा। कोश तैयार करने में देश के सभी राज्यों में रामायण संस्कृति के स्थापत्य, मूर्ति, चित्र, अभिलेख, ग्रंथ, पुस्तकों, परंपराओं, कलाओं की जानकारियों को शामिल किया जाना है।
तुलसीदास पर इनकी दो पुस्तकें हैं
प्रो. उमापति दीक्षित ने ‘तुलसी का सौंदर्य बोध एवं उनकी मूल्य दृष्टि’ विषय पर डी. लिट. की है। इनकी तुलसीदास पर दो पुस्तकें भी हैं ‘कालजयी संत तुलसीदास’ और ‘तुलसी काव्य के विविध आयाम’। इनका मानस स्तुतियों का ऑडियो कैसेट्स वर्ष 2001 में प्रकाशित हो चुका है। इन्हें विद्यार्थी जीवन से ही शिवतांडव स्रोत और रामचरितमानस का सुंदरकांड कंठस्थ है।