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एक्सक्लूसिव: दादा-दादी, नाना-नानी से मिला मर्ज, बचपन झेल रहा गठिया का दर्द, ये हैं लक्षण

Wed, 22 Sep 2021 12:01 PM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क अमर उजाला, आगरा

सार

चिकित्सकों का कहना है कि इस बीमारी का इलाज न कराने पर कमर-हड्डियों में लचक, कूबड़ होने का भी खतरा रहता है। वहीं ऊंचाई भी प्रभावित होती है। बच्चों का मानसिक विकास भी नहीं हो पाता है। 
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जुबेनाइल गठिया - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बच्चों को दादा-दादी और नाना-नानी से अनचाहे रूप में जीवन भर सालने वाला मर्ज मिल रहा है। बचपन तो दर्द में बीतता ही इलाज में देरी से कूबड़, कमर-हड्डियों में लचक स्थायी बन जाती है। यह बीमारी जुबेनाइल गठिया है। जेनेटिक है और छोटी उम्र में ही लक्षण उभरते हैं। 90 फीसदी मरीजों में  बीमारी दादा-दादी, नाना-नानी से मिली है।   

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एसएन कॉलेज में गठिया रोग ओपीडी की प्रभारी डॉ. अंजना पांडे ने बताया कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों में गठिया की सबसे बड़ी वजह जेनेटिक है। सप्ताह में एक दिन लगने वाली विशेष ओपीडी में 100 से 120 मरीजों में आठ से 12 मरीज 16 साल के कम के हैं। केस हिस्ट्री में बच्चों के दादा-दादी, नाना-नानी, माता-पिता में गठिया मिली। इनमें छह से सात मामलों में दादा-दादी और नाना-नानी के चलते आनुवंशिकी रूप से बच्चों में पनपी। दो से तीन बच्चों के पैर, अंगुलियों में तिरछापन मिला। शुरूआत में कई लोग इसे दिव्यांगता मानते रहे। बच्चे को दर्द-परेशानियां बढ़ने पर डॉक्टरों को दिखाने लाए। जांच में जुबेनाइल गठिया निकला। सबसे कम उम्र के मरीज की उम्र दो साल है।

दवा से फायदा, जरूरत पर ऑपरेशन 
डॉ. पांडे ने बताया कि शुरूआत में ही बच्चा आने पर दवाएं देते हैं। इससे मर्ज में फायदा पहुंचता है और उम्र बढ़ने के साथ दवाएं कम करते हैं। इलाज कई साल तक चलता है। तिरछापन मिलने पर ऑपरेशन भी करते हैं। कोरोना महामारी से पहले 2019 में 27 और महामारी में नौ बच्चों के ऑपरेशन किए हैं।

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शारीरिक गतिविधि न करने से परेशानी
एसएन के हड्डी रोग विभागाध्यक्ष डॉ. सीपी पाल ने बताया कि ओपीडी में औसतन रोजाना 240 से 280 मरीजों में से 15 से 20 साल के 10 से 12 मरीजों में गठिया की शिकायत मिली। इनमें मोटापा, शारीरिक गतिविधियां कम करना, कंप्यूटर या फिर बैठने का कार्य अधिक करने वाले हैं। अधिक वजन से जोड़ों पर अतिरिक्त भार से इनमें दर्द उभरने लगा। इससे बचने को शारीरिक गतिविधियों से बचने लगे और समस्या बढ़ने लगती है।   

केस एक 
बरहन के नौ साल के बच्चे के पैरों में दर्द रहता, सूजन भी रही, घर पर ही तेल से मालिश करते रहे। दर्द कम नहीं हुआ और पैर टेढ़े होने पर डॉक्टरों को दिखाया। इसकी नानी को गठिया था, मां को भी कभी-कभार जोड़ों में दर्द उभरता है।
केस दो
फतेहाबाद के 13 साल के बच्चे में पैर तिरछा होने के बाद परिजन अस्पताल में दिखाने लाए। अभी इसकी दवाएं चल रहीं हैं। चिकित्सकों ने बताया कि अंगुलियों में गांठ पड़ गई हैं, जोड़ से नीचे पैर तिरछे हो गए हैं, जरूरत पर ऑपरेशन करेंगे।

 
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ये हैं लक्षण
- जोड़ों में दर्द, सूजन, तेज बुखार आना।
- आंखों में लाली, मुंह में छाले रहना।
- पैर, अंगुली तिरछापन, दर्द रहना। 
- पेशाब करते वक्त जलन होना।
- हाथ-पैर समेत शरीर पर लाल चकत्ते।
- कभी-कभी शौच के वक्त खून आना।

ये होती है परेशानी
- बच्चे की ऊंचाई कम रह जाती है। 
- मानसिक विकास पूरी तरह से नहीं होता।
- पीठ पर कूबड़ हो सकता है। 
- कमर में लचक होना, पैरों में तिरछापन।

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