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अपराजिता: 'पिता ने मना किया, पति ने पीटा, पर मैं वकील बनकर ही मानी' पढ़ें महिला वकीलों के संघर्ष की कहानी

Sat, 08 Aug 2020 09:53 PM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा

सार

  • पहले घर में और फिर कचहरी में उनके सामने चुनौतियां आती हैं।
  • लॉ की पढ़ाई से लेकर प्रैक्टिस तक संघर्ष कर रही हैं महिला वकील
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महिला वकील - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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लोगों को इंसाफ दिलाने का जिम्मा लेकर वकील बनीं महिलाओं को भी हर कदम पर संघर्ष करना पड़ रहा है। इसकी शुरुआत लॉ में दाखिला लेते ही हो जाती है। दरअसल, समाज में अभी भी कुछ लोग वकालत को महिलाओं के लिए सुरक्षित पेशा नहीं माना जाता। शायद इसीलिए महिला वकीलों की संख्या भी कम है। आगरा दीवानी कचहरी में कुल 6000 वकील हैं, इनमें महिलाएं 10 फीसदी से भी कम हैं। 450 ही महिला वकील हैं। पढ़िए ऐसी ही महिला वकीलों के संघर्ष की कहानी... 
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लॉ के फार्म पर पिता ने दस्तखत करने से कर दिया था मना


एडवोकेट दीपिका 2016 से वकालत कर रही हैं। उन्होंने बताया कि पिता आईटीआई में प्रोफेसर थे। मैंने उनसे कहा कि मुझे वकील बनना है तो आग बबूला हो गए। मुझे लगा कि उन्हें मना लूंगी, इसलिए आगरा कॉलेज से लॉ में दाखिले का फॉर्म ले गई। उन्होंने दस्तखत करने से मना कर दिया। उन्हें यह कहकर मनाया कि वकील नहीं बनूंगी, सिविल सर्विस में जाऊंगी। 2008 में लॉ करने के बाद मुझे प्रैक्टिस नहीं करने दी, 2014 में शादी कर दी। पति ने कहा कि यदि प्रैक्टिस करने की बात भी की तो टांगें तोड़ दूंगा। सिर्फ कहा ही नहीं, कर भी दिया, मुझे पीटा। मैंने फिर भी हार नहीं मानी, पति से अलग हो गई, 2016 से वकालत कर रही हूं।

फिकरे कसते थे लोग, कचहरी में तुम्हारा क्या काम है?

दीपिका ने बताया कि जब प्रैक्टिस शुरू की तो कचहरी के अंदर और बाहर बहुत बुरा-भला सुनना पड़ा। कचहरी में लोग फिकरे कसते थे, कहते कचहरी में तुम्हारा क्या काम। ये महिला है, कितने दिन टिक पाएगी, ज्यादा से ज्यादा दो साल में चली जाएगी। परिवार के लोग शक करते। इतना तक कहा, आज तो हड़ताल थी, तू कचहरी में क्या करने गई थी। और क्या कहूं, मैंने साथी वकीलों को बताया कि पति पीटता है, कई का जवाब था, तो क्या हुआ? जैसा भी है, उसी के साथ रहो।
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ये चुनौतियां आईं सामने

- महिला हूं, इसलिए कई पुरुष वकील मुझे टिकने नहीं देना चाहते थे।
- महिला वकीलों को हतोत्साहित किया जाता है, मुझे भी किया गया।
- चैंबर के लिए लड़ रही हूं, आज तक नहीं मिला।

'पिता वकील थे, फिर भी मुझे वकालत करने से रोकते थे'

भावना कुलश्रेष्ठ 2018 से प्रैक्टिस कर रही हैं। उन्होंने बताया कि पिता अशोक कुलश्रेष्ठ बड़े वकील थे, लेकिन मुझे वकालत करने से रोकते थे। मैंने 2015 में लॉ किया। प्रैक्टिस करनी चाही तो पिता ने कहा कचहरी में महिलाओं के लिए सुरक्षित माहौल नहीं है। मैंने जिद की, तब भी नहीं माने। रिश्तेदार भी उनकी बात को सही कहते थे। लेकिन मैंने सोच रखा था कि वकालत तो करनी ही है। पिता को चिंता रहती थी कि इस माहौल में मैं कैसे काम कर पाऊंगी। उनके निधन के बाद उनकी विरासत को संभालने के लिए वकील बनी। शुरू में यहां कचहरी में लोग मुझ पर ताने कसते थे, ये कैसे कर पाएगी वकालत। लेकिन, मैं न रुकी, न डरी। 

'सिस्टम का विरोध करो तो लोग घेर लेते हैं'

भावना ने कहा कि कचहरी में एक विद्यार्थी की तरह आई, सब कुछ सीखा। महिला वकीलों के सामने कई समस्याएं आती हैं, मेरे सामने भी आईं। चैंबर तो पिता का मिल गया था, लेकिन यहां महिला शौचालय तक नहीं। किससे कहें, कोई सुनता भी नहीं। सिस्टम का विरोध करो तो लोग घेर लेते हैं। महिला वकीलों के लिए ऐसा माहौल नहीं जिसमें वे खुद को सुरक्षित समझें। पुरुषवादी मानसिकता के कुछ लोग हैं जो सोचते हैं कि महिला वकीलों को आगे नहीं बढ़ने देना है, लेकिन यह मुमकिन नहीं है।

ये चुनौतियां हैं बड़ीं
- यहां महिलाओं के लिए शौचालय नहीं, यह बहुत बड़ी समस्या है।
- मैंने सोचा था कि कचहरी में सुरक्षा भरा माहौल होगा, लेकिन यह नहीं मिला।
- कोई ऐसा फोरम नहीं मिला जहां महिला वकीलों की समस्याओं का समाधान हो।
 

रिश्तेदार कहते थे- तुम लड़की हो, टीचर बनो, वकील नहीं

अपर जिला शासकीय अधिवक्ता (एडीजीसी) पूनम गुप्ता ने 2004 में लॉ किया। उन्होंने बताया कि तब जो भी रिश्तेदार मिलता, एक ही बात कहता, तुम लड़की हो, ज्यादा उड़ो नहीं, कुछ बनना है तो टीचर बनो, वकील नहीं। सबको समझाया, कोई माना तो कोई नहीं भी माना, लेकिन मैंने रास्ता नहीं छोड़ा। मन में ठान लिया था। जो सहेलियां लॉ में साथ नहीं आईं, वे भी कहती थीं कि वकालत सुरक्षित जॉब नहीं है, लेकिन मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पढ़ाई में ध्यान लगाया और 2005 से प्रैक्टिस शुरू कर दी। जैसे-जैसे प्रैक्टिस जमती गई, वैसे-वैसे कहने वालों के मुंह बंद होते चले गए। इन सब मुश्किलों के बीच पिता देवेंद्र कुमार गुप्ता ने हमेशा सहयोग किया।

पूनम गुप्ता ने कहा कि जब प्रैक्टिस के लिए आई तो सोचा था कि अच्छा माहौल होगा, पुरुष वकील मदद करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पहले दिन परिचय के दौरान ही एक साथी वकील ने कहा, यहां समय बर्बाद न करो, कुछ और काम कर लो। तुम महिला हो, यहां लोग महिलाओं को गवाही के लिए भी नहीं लाते, तुम वकालत की सोच रही हो। जूनियर महिला वकीलों से क्लाइंट भी अजीब तरह पेश आते हैं। मुझसे इस तरह के सवाल करते थे, तुम महिला हो हत्या का केस लड़ पाओगी। एक दिन तो मुझे लगा कि बेहतर होता यदि टीचर बन जाती, लेकिन महिला वकील साथियों ने हिम्मत दी। मैंने अपनी जगह बनाई।

ये आईं चुनौतियां

- महिला वकीलों को प्रोत्साहन नहीं मिलता, मुझे हतोत्साहित किया गया।
- महिला वकीलों के लिए सुरक्षित माहौल नहीं।
- महिला वकीलों के लिए अलग हॉल नहीं, जहां वे आपस में बात कर सकें।

बच्चे बड़े हो गए, तब मिली प्रैक्टिस की इजाजत

एडीजीसी मधु शर्मा ने बताया कि वो दो साल की थी जब पिता का निधन हो गया। हम पांच भाई, तीन बहन हैं, मैं सबसे छोटी हूं। परवरिश भाइयों ने की। मुझे पढ़ाया। मैंने 1990 में लॅा कर लिया, 1997 में मेरी शादी हो गई। अब मुझे प्रैक्टिस शुरू करनी थी, लेकिन ससुराल की इजाजत नहीं मिली। सबको समझाया कि इसमें कुछ गलत नहीं है। रिश्तेदार कहते थे कि वकालत महिलाओं के लिए ठीक नहीं, खतरा है। मैं जिद पर अड़ी रही, आखिर वे मान गए, लेकिन तब तक 2007 आ चुका था। बच्चे बड़े हो चुके थे, इसीलिए इजाजत भी मिल गई।

'मेरा सामान ही चोरी कर लिया था'
मैंने चैंबर के लिए संघर्ष किया तो कचहरी में कई लोग मेरे विरोधी हो गए। चैंबर मिला तो उसका ताला तोड़ दिया और सामान चोरी कर लिया। मैं महिला थी, यही सोचकर मेरे साथ यह किया गया, लेकिन मैं डरी नहीं, रिपोर्ट दर्ज कराई। सामान बरामद हुआ। मुझे हतोत्साहित करने के लिए लोग कहते थे, ये ज्यादा दिन नहीं रहेगी। आज वे ही लोग कहते हैं, ये आयरन लेडी है, इससे मत उलझना। मैं 2017 में सरकारी वकील बन गई।

ये चुनौतियां सामने आईं
- महिला वकीलों को चैंबर न मिल पाना सबसे बड़ी समस्या है, मैं भी इससे परेशान रही।
- नई महिला वकीलों को हतोत्साहित किया जाता है, मुझे भी किया, लेकिन मैंने खुद को साबित किया।
- बार में महिला सदस्य कम हैं, इसलिए उनकी सुनवाई भी कम है।
 
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'मुझे वकालत करने से रोकने के लिए झूठी शिकायतें कीं'

विशेष लोक अभियोजक (पोक्सो कोर्ट) विमलेश आनंद ने बताया कि मैं भाग्यशाली हूं कि परिवार का साथ मिला। 1990 में लॉ किया। मैं जज बनना चाहती थी, पीसीएस जे की लिखित परीक्षा पास भी कर ली थी, लेकिन इसके बाद किस्मत ने साथ नहीं दिया। खैर कोई बात नहीं, 1998 से प्रैक्टिस शुरू कर दी। सरकारी वकील बन गई। अब कुछ लोगों को लगा कि यह महिला है, इसे हटाया जाए। झूठी शिकायतें की गईं, लेकिन झूठ कितने दिन चलता है। मैं डरी नहीं, शासन में दृढ़ता से बात रखी। आखिर में जीत सच की हुई। महिला वकीलों के सामने ऐसी समस्याएं आती हैं, उन्हें इनका सामना करना चाहिए।

'यहां जगह मिलती नहीं, बनानी पड़ती है'
विमलेश ने कहा कि कचहरी में महिला वकील को जगह मिलती नहीं है, उसे अपनी जगह बनानी पड़ती है। यह मेरे साथ हुआ और सबके साथ होता है। चैंबर के लिए तमाम पापड़ बेले, लेकिन 10 साल में भी यह नहीं मिला। जबकि कई वकीलों को यह दो दिन में भी मिल गया। सरकारी वकील बनने के बाद मिल पाया। हम अपना हक मांगें तो वे झगड़ा करने पर उतारू हो जाते हैं। मैं खुशकिस्मत हूं कि सीनियर अच्छे मिले, लेकिन ऐसा सबके साथ नहीं होता है।

ये चुनौतियां आईं
- महिला वकीलों को चैंबर नहीं मिलते, मुझे भी यह दिक्कत आई।
- कपड़े बदलने के लिए अलग कमरा नहीं है। इसके लिए बार से शिकायत भी की।
- महिला वकील आपस में बात करना चाहें तो उसके लिए अलग से हॉल नहीं है।
 
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