अक्षय तृतीया इस बार मंगलवार को रोहिणी नक्षत्र में शोभन योग में सूर्य व चंद्रमा के उच्च राशियों में मनाई जाएगी। मालव्य योग, महापुरुष योग शश महापुरुष योग निर्मित हो रहे हैं। ऐसा संयोग 89 साल बाद बन रहा है। यदि आपका कोई शुभ कार्य संयोग के लिए रुका है तो आप इस दिन कर सकते हैं।
आगरा। प्राचीन सिद्धि विनायक मंदिर के महंत पंडित ज्ञानेश शास्त्री बताते हैं कि अक्षय तृतीया को भगवान विष्णु एवं महालक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए। इस दिन सोने- चांदी के आभूषण खरीदने की भी परंपरा है। इससे लक्ष्मी जी की कृपा बनी रहती है। अक्षय तृतीया को मां गौरी का पर्व भी माना जाता है। इस दिन मां गौरी की पूजा करके वैवाहिक सुख की कामना की जाती है। जिनका विवाह नहीं हो पा रहा है, उन्हें भी शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव और गौरी मां की पूजा करनी चाहिए।
महंत शास्त्री ने बताया कि इस दिन नदियों में स्नान के बाद दान पुण्य का विशेष महत्व है। जल से भरा कलश, चरण पादुका, फल, छाता, गाय, सत्तू, शर्बत, सोने व चांदी की वस्तुओं का दान किया जाता है। शिव मंदिरों में जल से भरा कलश व खरबूजा व तरबूज चढ़ाए जाते हैं।
वेदों में वर्णित है यदि आपकी जन्म कुंडली में ग्रहों के अस्त होने के कारण उनसे अशुभ परिणाम मिल रहे हों तो अक्षय तृतीया के दिन प्रात: काल ताम्र पात्र में जल लेकर भगवान सूर्य को पूरब दिशा की तरफ मुंह करके जल अर्पित करना चाहिए।
स्कंद पुराण में वर्णित है कि अक्षय तृतीया को पुनर्वसु नक्षत्र में रात्रि के प्रथम पहर में भगवान विष्णु ने परशुराम जी के रूप में अवतार लिया था। उनके जन्म के दिन 6 ग्रह अपनी उच्च राशियों में थे। परशुराम विष्णु जी के छठे अवतार हैं। इनके पिता महर्षि जमदग्नि और मां का नाम रेणुका था।