फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

श्री पारस अस्पताल प्रकरण: 16 मृतकों का ही कराया डेथ ऑडिट, मौत का कारण तक नहीं बताया

Sun, 04 Jul 2021 04:25 PM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा

सार

आगरा के श्री पारस अस्पताल के दमघोंट प्रकरण की जांच पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। अब मृतकों के डेथ ऑडिट को लेकर सवाल उठे हैं। इस रिपोर्ट में पढ़िए क्या है पूरा मामला...
विज्ञापन
श्री पारस अस्पताल प्रकरण - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

आगरा के श्री पारस अस्पताल में दमघोंटू मॉकड्रिल के रहस्यों से पर्दा उठना बाकी है। उपमुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा ने प्रशासनिक जांच को सतही बताकर कठघरे में खड़ा कर दिया है। इधर प्रशासन अब गेंद पुलिस के पाले में डालकर खुद बचने की कोशिश कर रहा है। इस बीच मृतकों का डेथ ऑडिट करने वाली कमेटी पर भी जांच के नाम पर लीपापोती करने के आरोप लग रहे हैं। 

विज्ञापन


पुलिस मामले में संदिग्ध युवक के मोबाइल की जांच करा रही है। मामले में पीड़ितों के मुकदमे दर्ज कराने के लिए अधिवक्ताओं का प्रतिनिधिमंडल सोमवार को एसएसपी से मिलेगा। आईएमए की जांच समिति 22 दिन में अभी तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंची। शनिवार को समिति को 25 और 26 अप्रैल की सूची मिली है, इसमें 25 की सुबह कितने मरीज भर्ती थे, यह जानकारी दर्ज नहीं है।

श्री पारस अस्पताल में दमघोंटू मॉकड्रिल के दिन 96 मरीज भर्ती थे। जिनमें 22 की हालत गंभीर थी। प्रशासन ने डेथ ऑडिट महज 16 मृतकों का कराया है। बाकी मृतकों का ऑडिट ही नहीं किया गया। 96 भर्ती मरीजों की बीएचटी (बेड हेड टिकट) तक नहीं जांची गई। डेथ ऑडिट विवरण जारी होने के 15 दिन बाद भी सबसे बड़ा सवाल है कि उन दो दिनों में कुल मरीजों ने दम तोड़ा।

विज्ञापन

इन्होंने किया था डेथ ऑडिट
मॉकड्रिल के सात जून को वीडियो वायरल हुए। 12 जून को जिलाधिकारी ने एसएन मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन के डॉ. बलबीर सिंह, एनीस्थीसिया के डॉ. त्रिलोक चंद पिप्पल, फोरेंसिंक की डॉ. रिचा श्रीवास्तव और एसीएमओ डॉ. पीके शर्मा की डेथ ऑडिट कमेटी बनाई।

जिलाधिकारी ने प्रशासन की ओर से जब्त रिकॉर्ड व 10 पीड़ितों की फाइलों सहित 16 मृतकों के ऑडिट का कमेटी को निर्देश दिया। यहां सवाल खड़ा हो गया है कि प्रशासन ने सभी मरीजों का ऑडिट क्यों नहीं कराया। ऑडिट के लिए कमेटी चार बार श्रीपारस हॉस्पिटल में गई। 

चुनिंदा बीएचटी व मरीजों की फाइलों के आधार पर रिपोर्ट बनाई। 18 जून को प्रशासन ने 16 मृतकों का डेथ ऑडिट विवरण जारी किया। जिसमें कहीं इस बात का जिक्र नहीं है कि मृतकों का ऑक्सीजन फ्लो कितना था। उनकी मृत्यु का कारण क्या है। पांच पृष्ठ की ऑडिट रिपोर्ट में सिर्फ एक पृष्ठ का विवरण ही सार्वजनिक किया है। 

जो रिकॉर्ड मिला, उससे ऑडिट किया
डेथ ऑडिट कमेटी के सदस्य प्रोफेसर बलवीर सिंह ने कहा कि प्रशासन ने 16 मृतकों का रिकॉर्ड दिया था। उसी रिकॉर्ड से ऑडिट किया है। चारों सदस्यों ने हस्ताक्षर किए हैं। प्रशासन को रिपोर्ट भेज चुके हैं। इससे अधिक मैं कुछ भी नहीं बता सकता।

डीएम बोले- नहीं लगता कोई गड़बड़ी है
डेथ ऑडिट में गड़बड़ी के सवाल पर जिलाधिकारी प्रभु एन सिंह का कहना है कि मैं डॉक्टर नहीं हूं। मुझे नहीं लगता कोई गड़बड़ी है। संयुक्त कमेटी ने ऑडिट किया है। अगर कोई गड़बड़ी सामने आएगी तो वो स्वयं जिम्मेदार होंगे।

विशेषज्ञ बोले: ऑडिट के नाम पर लीपापोती
चिकित्सा एवं विधि मामलों के विशेषज्ञ डॉ देवेंद्र गुप्ता ने कहा कि डेथ ऑडिट ऐसे नहीं होता है। रिपोर्ट में लीपापोती की गई है। कुछ भी स्पष्ट नहीं। अगर किसी ने कोर्ट में रिपोर्ट को चुनौती दी तो सबके लिए मुसीबत खड़ी हो जाएगी। बीएचटी की जांच नहीं की गई। उनमें किसके नोट्स हैं। कौन ड्यूटी डॉक्टर था। 

उन्होंने कहा कि आईसीयू में भर्ती मरीजों के संबंध में आकस्मिक निर्णय के लिए तीन विशेषज्ञ चिकित्सक एमडी मेडिसिन, एमडी एनेस्थीसिया व एमडी जनरल सर्जरी का होना आवश्यक होता है। अगर विशेषज्ञ नहीं थे तो फिर संचालक ने मॉकड्रिल या कथित विनिंग प्रोसेस का निर्णय कैसे लिया। 
विज्ञापन

सवाल: ये कैसी जांच 
- 96 मरीज क्या अकेले डॉ. अरिंजय जैन के अंडर में भर्ती थे।
- अगर नहीं, तो 96 मरीजों के उपचार के लिए कितने डॉक्टर थे।
- 22 मरीज गंभीर थे, जिनमें 16 की मौत हुई बाकी का क्या हुआ।
- मरीजों की बीएचटी पर डॉक्टर ने क्या नोट्स व ट्रीटमेंट लिखे।
- डेथ ऑडिट व जांच टीमों ने क्या किसी ड्यूटी डॉक्टर के बयान लिए।
- डेथ ऑडिट कमेटी ने सभी मृतकों का ऑडिट क्यों नहीं किया।
- क्या आईसीयू मानक सही थे, अगर नहीं तो क्या ये लापरवाही नहीं।
- ऑडिट में आरोपित संचालक के परिचित डॉक्टर क्यों शामिल हैं।

ऑक्सीजन की कमी मानी, लेकिन मौतें नहीं
जिला प्रशासन ने अस्पताल संचालक को जांच में ऑक्सीजन की कमी का हवाला देकर मरीजों में भ्रम फैलाने का दोषी माना है। लेकिन मॉकड्रिल के वायरल वीडियो में संचालक के उस कथित बयान को नजर अंदाज कर दिया जिसमें वह कह रहे हैं कि ट्रायल मार लेते हैं...जितने बचने होंगे बच जाएंगे...। यहां सवाल उठ रहा है कि इस पहलू पर जांच क्यों नहीं की गई।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें