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कैराना में गठबंधन की जीत से बदलेंगे ब्रज के सियासी समीकरण, जानें किस सीट पर क्या होगा असर

Sat, 02 Jun 2018 10:27 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला आगरा
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गठबंध्ान - फोटो : अमर उजाला
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पहले गोरखपुर और फूलपुर में भाजपा को हार मिली और अब कैराना में कमल का फूल मुरझा गया। उपचुनाव के नतीजे भाजपा के लिए टेंशन हैं, तो विपक्ष को नई ऊर्जा मिल गई है। ब्रज की सियासत में भी हलचल महसूस की जा सकती है। 
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सपा, बसपा, रालोद और कांग्रेस के टिकट दावेदार अभी से सक्रिय हो गए हैं। जाहिर है भाजपा की राह मुश्किल हो गई है। ब्रज में सपा, बसपा और रालोद का मजबूत वोट बैंक है। मथुरा में जाट वोटर बेहद अहम होते हैं। 

2009 में जयंत चौधरी चुनाव यहीं से जीते थे। 2014 में मुजफ्फरनगर दंगे के कारण ऐसा ध्रुवीकरण हुआ कि कैराना, मुजफ्फरनगर और बागपत की तरह यहां के जाट भी भगवा रंग में रंग गए थे। अब कहानी बदलती लग रही है। 
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फाइल फोटो
फतेहपुर सीकरी में भी जाट वोटर काफी हैं। जैसे रालोद से जाटों ने दूरी बनाई थी, वैसे ही दलित हाथी से उतर आए थे। आगरा में 30 फीसदी दलित वोटर बताए जाते हैं। इसे दलितों की राजधानी कहा जाता है। 

अब दलित फिर से नीले रंग में रंगते नजर आ रहे हैं। ब्रज में साइकिल की भी अपनी पकड़ है। फिरोजाबाद, मैनपुरी और एटा सपा के मजबूत किले रहे हैं। इतने मजबूत कि फिरोजाबाद और मैनपुरी तो 2014 की मोदी लहर में भी नहीं हिले। 

अगर तीनों शक्तियां मिल गई तो भाजपा के लिए लड़ाई आसान नहीं होने वाली है। यही वजह है कि विपक्ष के टिकट में अब जीत की उम्मीद नजर आने लगी है। इसलिए दावेदारों की लाइन लग गई है। दावेदारी गोरखपुर और फूलपुर में भाजपा की हार से ही शुरू हो गई थी। कैराना से और तेज हो जाएगी।

BJP
भाजपाइयों तक में इस बात का मलाल है कि ताजनगरी से नौ के नौ विधायक होने पर भी एक भी मंत्री नहीं बनाया गया। उपचुनाव के नतीजों के बाद ऐसे गिले-शिकवे दूर किए गए तो ताजनगरी को एक मंत्री मिल सकता है।

गंगाजल, स्मार्ट सिटी, बैराज जैसी तमाम योजनाएं हैं जिनकी घोषणा की गई है लेकिन चुनाव से पहले इनके पूरा होने की उम्मीद कम ही है। ऐसे में इन प्रोजेक्ट की रफ्तार अब तेज हो सकती है ताकि जनता को लगे कि सरकार सिर्फ घोषणाएं नहीं, काम भी कर रही है।

न सांसदों में बन रही है। न मेयर और विधायक में। भाजपा के नेता एक दूसरे पर निशाना ही नहीं साध रहे खिल्ली तक उड़ा रहे हैं। हाईकमान अभी तक इसे हलके में लेता रहा है। अब मिशन 2019 की बारी है। शायद अब आलाकमान के नेताओं की आंख खुल जाए।
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कहां किसका दावा है मजबूत

by-election
आगरा: 2014 में भाजपा के रामशंकर कठेरिया जीते थे। बसपा नंबर दो और सपा नंबर तीन पर रहे। गठबंधन में बसपा की दावेदारी मजबूत बताई जा रही है। सपा भी दावा आसानी से छोड़ने वाली नहीं।

फतेहपुर सीकरी: 2014 में भाजपा के चौधरी बाबूलाल जीते थे। दूसरे नंबर पर रहीं बसपा की सीमा उपाध्याय फिर सक्रिय नजर आ रही हैं। कांग्रेसियों का कहना है कि इस बार राजबब्बर यहां से किस्मत आजमाना चाहते हैं।

मथुरा: 2014 में भाजपा की हेमा मालिनी जीती थीं। दूसरे नंबर पर रालोद के जयंत चौधरी रहे थे। रालोद एक बार फिर उन्हें ही उतारना चाहता था। रालोदियों की एक राय यह भी है कि इस बार हेमा के सामने चारू चौधरी को उतारा जाए।

फिरोजाबाद: सपा का मजबूत गढ़ है। मोदी लहर में भी सपा के अक्षय यादव जीते थे। गठबंधन के दलों में इस बार भी सपा का दावा ही मजबूत है।

मैनपुरी: यह भी सपा का मजबूत किला है। 2014 में मुलायम सिंह यादव जीते। उनके सीट खाली करने पर तेज प्रताप सांसद बने। गठबंधन में भी सपा का ही उम्मीदवार उतरना तय है।

एटा: 2014 में भाजपा के राजवीर सिंह जीते थे। सपा दूसरे और बसपा तीसरे स्थान पर रही। गठबंधन की सूरत में सपा इस सीट को छोड़ना नहीं चाहेगी जबकि बसपा भी जोर लगाएगी।
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