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पांच साल बाद भी मूर्तियों का रहस्य बरकरार

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मैनपुरी/औंछा। पांच वर्ष का समय बीतने के बाद भी बेशकीमती मूर्तियां चोरी होने का रहस्य अभी भी बरकरार है। 2013 में कस्बा में खुदाई के दौरान भगवान हरिहर की बेशकीमती मूर्तियों के साथ ही अन्य मूर्तियां भी मिलीं थीं। जो कुछ दिन बाद ही चोरी कर लीं गईं थी। थाने में मामला दर्ज कराया गया। मगर अभी तक मूर्तियों के बारे में कोई जानकारी नहीं हो सकी है।


कस्बा 88 हजार ऋषि मुनियों की तपस्थली के नाम से पहचाना जाता है। इसका जीता जागता उदाहरण जगह जगह ऋषि मुनियों के टीले हैं। कई बार यहां खोदाई के दौरान कई बेशकीमती मूर्तियां आदि मिलीं। नौ जुलाई 2013 को श्रृंगी ऋषि आश्रम में 13 फुट का नरकंकाल मिलने के बाद पुरातत्व विभाग की टीम पहुंची थी। इसके बाद खोदाई जारी रही तो 13 जुलाई को 10वीं सदी की भगवान हरिहर की बेशकीमती प्रतिमा निकली थी। बेशकीमती मूर्ति मिलने के बाद शासन प्रशासन भी सतर्क हो गया था। एक समय में तो औंछा को पर्यटन क्षेत्र नक्शे में शामिल किए जाने की बात तक की गई। मामला ठंडे बस्ते में चला गया। इस बीच 13 फीट के नरकंकाल को तांत्रिकों की नजर लग गई।
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कंकाल के सिर की कीमत लाखों रुपये लगाई जाने लगी। तो आश्रम के साधुओ ने कई रात जाग कर उसकी रक्षा की बाद में उसे एक पक्की ईटो की समाधी में बंद कर दिया। 25 अक्तूबर 2013 को बेशकीमती भगवान हरिहर की मूर्ति भी चोरी कर ली गई। मूर्ति चोरी होने के बाद कस्बाइयों ने आक्रोश व्यक्त किया। थाने में अभियोग भी पंजीकृत कराया गया। मगर पांच वर्ष बीतने के बाद अभी तक मूर्ति का कोई पता नहीं लग सका है। आज भी साधु-संत व क्षेत्रवासी भगवान हरिहर की मूर्ति वापस आने की उम्मीद पाले हुए हैं।
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च्यवन ऋषि की पावन धरा कहे जाने वाले कस्बा औंछा से विश्व प्रसिद्ध ब्रंाड च्यवनप्राश की उत्पत्ति बताई गई है। कहते हैं च्यवन ऋषि ने ही च्यवनप्राश की खोज की थी। साथ ही मान्यता है कि अजोम कुंड में नहाने से जटिल से जटिल चर्म रोग दूर हो जाता है। मगर इन दिनों कुंड अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।
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