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क्रांतिकारी पार्टी बनाकर युवाओं को जोड़ा

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मैनपुरी। स्वतंत्रता सेनानी महेशचंद्र वर्मा ने जमींदारी छोड़कर छात्र जीवन में ही देश को आजाद कराने का संकल्प लिया था। उन्होंने क्रांतिकारियों के साथ मिलकर अंग्रेजी हुकूमत को देश से निकालने के लिए खूब संघर्ष किया। उन्हें असहयोग आंदोलन में भाग लेने पर सजा भी काटनी पड़ी थी।
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जमींदार प्यारेलाल वर्मा के द्वितीय पुत्र के रूप में तीन सितंबर 1919 को जन्मे महेश चंद्र वर्मा 1934 में मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण की। तत्कालीन परिस्थितियों से उद्वेलित महेश चंद्र वर्मा के मन में छात्र जीवन से ही अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आग भड़क उठी। उन्होंने आसपास के नौजवानों को संगठित कर क्रांतिकारी पार्टी बनाई और स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े। नेताजी सुभाष चंद्र बोस जिले में आए तो महेशचंद्र वर्मा ने फारवर्ड ब्लाक की सदस्यता ग्रहण की। अंग्रेजी दूर संचार व्यवस्था को भंग करने के लिए उन्होंने कई स्थानों से टेलीफोन तार काटे।

अंग्रेज पुलिस के छापों के चलते उनको भूमिगत भी होना पड़ा। इसी दौरान अखिल भारतीय क्रांतिकारी पार्टी के अध्यक्ष योगेश चंद्र चटर्जी, पुत्तूलाल चौहान, जगदीश शुक्ल, विश्वनाथ सिंह ने भूमिगत रहते हुए महेशचंद्र वर्मा के घर पर शरण पाई। 20 अक्तूबर 1942 को योगेश चटर्जी को एटा में गिरफ्तार कर लिया गए। चटर्जी की डायरी में महेशचंद्र वर्मा का नाम और पता मिलने के बाद तत्कालीन सीआईडी इंस्पेक्टर आफताब हुसैन ने उनकी गिरफ्तारी की योजना बनाई। जगदीश शुक्ल को बंदी बनाकर उनसे महेशचंद्र वर्मा का सुराग लेकर अंग्रेज पुलिस ने उनको 11 फरवरी 1943 को पिस्टल, बम बनाने का सामान सहित गिरफ्तार कर लिया। 15 नवबंर 1944 को रिहा होकर वह पुन: क्रांतिकारी गतिविधियों में संलग्न हो गए। आजादी के बाद वह कांग्रेस से जुड़कर कई पदों पर रहे।
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योगेश चंद्र चटर्जी ने जिले के सभी थानों पर एक एक करके बम फेंकने की योजना बनाई। महेश वर्मा ने क्रांतिकारी साथी लाला गंगा सहाय गुप्त के साथ मिलकर कुरावली थाने पर बम फेंकने के लिए घर पर ही बम बनाया। बम बनाते समय लाला गंगा सहाय गुप्त की आंखों की रोशनी बम फटने से चली गई। जिसके चलते योजना पर अमल नहीं हो सका। शेर और शायरी लिखने के शौकीन महेश चंद्र वर्मा को उनके उपनाम मुहमल से भी जाना जाता था। अपने जीवन भर वह स्वतंत्रता दिवस पर होने वाले कार्यक्रमों में सक्रिय रहे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा थी। गांधी जयंती के दिन दो अक्तूबर 2009 को हे राम कहकर उन्होंने जीवन की अंतिम सांस ली।
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