जिले का निजामपुर गांव मात्र 600 लोगों की आबादी वाला छोटा सा गांव है, लेकिन बारात के प्रकरण के कारण यह छोटा सा गांव बड़ी सुर्खियों में आ गया है। लोगों की निगाहें अब इस छोटे से गांव पर लगी हुईं हैं। गांव की पूरी अर्थव्यवस्था सवर्ण परिवारों पर आधारित है। अन्य जातियों के जो लोग गांव में रहते हैं वे सवर्णों के खेतों पर ही मेहनत मजदूरी के लिए निर्भर हैं।
दलित परिवार व अन्य जातियों के लोगों के पास बहुत कम जमीनें हैं। किसी के पास तो बिल्कुल ही जमीनें नहीं और वे सब पट्टे पर खेती करते हैं। शीतल के पिता सत्यपाल और शीतल के चाचा के पास केवल 3-3 बीघा जमीन है। वे पट्टे पर भी जमीन लेकर खेती करते हैं और घर में पशुपालन। गांव में मुरारी पर कुल 1 बीघा जमीन है और वे खेतों में मजदूरी करते हैं और तांगा चलाते हैं। धरम पाल का गुजारा साढ़े तीन बीघा जमीन से नहीं होता तो उन्हें भी मजदूरी का सहारा लेना पड़ता है।
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किसी भी दलित परिवार पर पर्याप्त जमीन नहीं है। उन्हें सवर्णों के खेतों को पट्टे पर लेने और मजदूरी करने के लिए आश्रित होना पड़ता है। यही स्थिति कुशवाह समाज के लोगों की भी है। कुशवाह समाज के बुजुर्ग ज्ञान सिंह का कहना है कि उनकी 6 बीघा जमीन है और वे पशुपालन करते हैं। कुशवाह समाज के ही होतीलाल पर तो जमीन ही नहीं है। वह और उनका परिवार केवल मजदूरी ही करते हैं। कढ़ेरे समाज के गांव में 6 परिवार हैं। इनमें सभी के पास मामूली जमीन है। नेम सिंह कढ़ेरे बताते हैं कि उनके पास 2 बीघा जमीन है। वह गांव में ही सवर्ण परिवारों के खेतों में मजदूरी करते हैं। वहीं मुस्लिम परिवार के जलालुद्दीन का कहना है कि उनके पास भी जमीन नहीं है। वह मजदूरी व पशुपालन का काम ही करते हैं। वहीं सवर्ण समाज के राम प्रकाश का कहना है कि गांव में सब एक दूसरे से कार्य कराते हैं। गांव में हर किसी का पेट भरता है।
निजामपुर गांव का तिराहा गांव का ऐसा स्थान है जहां सुबह के समय गांव के सभी जातियों के लोग तिराहे पर एकत्रित होते हैं और एक दूसरे से मिलजुलकर सलामती जानते हैं। यह सिलसिला अब फिर से शुरू होने लगा है। गांव में लोगों के बीच दरकते रिश्तों की मजबूती की नींव फिर से और मजबूत बने यहीं गांव के लोगों की सोच है। हर जाति, समाज के लोग अब भी यही चाहते हैं।
गांव की कुल आबादी- 600
सवर्ण परिवार- 50
कुशवाह परिवार- 15
दलित परिवार- 8
कढ़ेरे परिवार- 6
मुस्लिम परिवार- 3
बालमीकि परिवार- 1