एटा। वादों का पिटारा लेकर पांच साल बाद एक बार फिर से प्रत्याशी जनता के सामने नतमस्तक हैं। हर दरवाजे पर वोटों के लिए दस्तक दी जा रही है। लोगों को विकास के सपने दिखाकर वोट हासिल करने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि लोग भी अब वादों से पहले क्षेत्र की मौजूदा तस्वीर को टटोल रहे हैं। नगर क्षेत्र में विकास के वादों की पड़ताल में जो तस्वीर सामने आई, डालते हैं उस पर एक नजर। साथ ही जानते हैं कि अपने प्रत्याशियों के वादों को....
हर ओर पानी, मुसीबत में जिंदगानी
शहर में सबसे बड़ी समस्या जलभराव की है। गलियां तालाबों में तब्दील हैं, तो नालियों की कीचड़ सड़क पर है। नगर के फूलबाग कालोनी, इस्लाम नगर, नई बस्ती समेत तमाम क्षेत्रों में यह नजारा आम है।
कूड़े के ढेरों ने लगाया स्वच्छता पर बट्टा
यूं तो गंदगी से निपटने के लिए शहरी क्षेत्र में बड़े-बड़े वादे किए गए। मगर पांच साल में गंदगी से निजात नहीं मिल सकी। हर रोज एक लाख रुपये के खर्च के बाद भी स्वच्छता रैकिंग में शहर को 403वां स्थान मिला। 202 कर्मचारियों की फौज और एक प्राइवेट कंपनी के दम भी पालिका गंदगी के दागों को मिटा नहीं सका।
सुंदरता के प्रयास भी अधूरे
शहर को सुंदर बनाने के प्रयासों पर गौर करें तो वहां भी नगर की जनता ठगी का शिकार हुई। तीन चौराहों के सुंदरीकरण के अलावा नगर के पार्क सुंदरता को तरसते रहे। पालिका में बजट के अभाव ने शहर की साख को कम किया।
जाम ने बढ़ाया सिरदर्द
बढ़ते वाहनोें के बोझ और संकरी सड़कों ने जाम का झाम बढ़ाया। जीटी रोड पर अतिक्रमण का राज हुआ, तो जनता की दिक्कतें बढ़ीं। पालिका की ओर से अतिक्रमण हटाओ अभियान तो चले, लेकिन वोटों की राजनीति में वे भी बेमानी साबित हुए।
घोटालों की खूब खुली पोल
नगर पालिका पांच साल तक घोटालों से जूझती रही। सड़क निर्माण के नाम पर घोटाले रहे हों या नाला सफाई के। पांच साल में जिम्मेदारों ने इतने घोटाले किए कि महालेखाकार विभाग की टीम को जांच के लिए आना पड़ा। जिसमें चार दोषी भी साबित हुए।
अब तक रहे अध्यक्ष्ा
अशरफ हुसैन- 1988 से 1992
विनय कुमार जैन- 1993 से 1994
गिरीश चंद्र मिश्रा- 1995 से 2000
अनुपम कुमार अड़ंगा- 2000 से 2002
कंचन अड़ंगा- 2006 से 2011
राकेश गांधी- 2012 से अब तक