अदूरदर्शिता व आधी-अधूरी तैयारियों का परिणाम क्या होता है, इसकी एक बानगी है बलरामपुर अस्पताल की सुपर स्पेशिएलिटी विंग। एक तरफ स्वास्थ्य मंत्री विंग के लोकार्पण की तैयारी में हैं वहीं दूसरी ओर चिकित्सकों की कमी इसके सफल संचालन पर शुरू होने से पहले ही कई सवाल खड़े कर रही है...
बढ़े हुए बेड, विशेष ओपीडी, मरीजों की बढ़ी संख्या से निपटना अस्पताल प्रशासन के लिए चुनौती साबित होगा। सुपर स्पेशिएलिटी विंग के लोकार्पण की तैयारी में जुटे प्रशासनिक अधिकारी अभी भी चिकित्सकों की कमी के लिए शासन की ओर टकटकी लगाए हुए हैं।
डॉक्टरों की है कमी
650 बेड के अस्पताल के 94 पद सृजित हैं। इनमें से मात्र 78 चिकित्सक ही अभी अस्पताल प्रशासन के पास हैं।
पहले से ही 16 डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे अस्पताल के लिए 100 अतिरक्ति बेड और नई विशेष ओपीडी चलाना चुनौती बना हुआ है।
सूत्रों के अनुसार गैस्ट्रो मेडिसिन, सर्जिकल गैस्ट्रोइंट्रोलॉजी, न्यूरोलॉजी, न्यूरो सर्जरी, यूरोलॉजी, नेफ्रोलॉजी विशेषताओं के लिए डीएम-एमसीएच चिकित्सक चाहिए। जबकि, असलियत ये है कि प्रांतीय चिकित्सा सेवा संवर्ग में डीएम डॉक्टर एक भी नहीं है। वहीं एमसीएच डिग्री वाले चिकित्सकों की संख्या अंगुलियों पर गिनी जा सकती है।
चलो ये है राहत की बात
बलरामपुर अस्पताल के लिए राहत बात की ये है कि वहां कम से कम यूरोलॉजिस्ट और न्यूरो सर्जन एमसीएच डिग्री वाले हैं। इसके बावजूद अन्य विभागों के लिए चिकित्सक जुटाने के लिए अस्पताल प्रशासन लगातार स्वास्थ्य मंत्री और प्रमुख सचिव से संपर्क में है।
शुरू हो सकती हैं ये यूनिट
अस्पताल प्रशासन के अनुसार लंबे समय से बंद पड़ी इंडोस्कोपी, कोलोनोस्कोपी यूनिट को भी शुरू करने की तैयारी है। एक चिकित्सक को इसके लिए प्रशिक्षण दिलाया गया है। 1991 से बलरामपुर अस्पताल में इंडोस्कोपी की व्यवस्था है, लेकिन बीते एक साल से इंडोस्कोपी बंद पड़ी है। वहीं कोलोनोस्कोपी कब से बंद है ये खुद अस्पताल प्रशासन नहीं जानता।