लखनऊ। रेडियो विकिरण से कैंसर का पता लगाने वाली पेट सीटी (पीईटी-पॉजीट्रॉन इमीशन टोमोग्राफी-सीटी) स्कैन सुविधा संजय गांधी पीजीआई के न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग में शुरू हो गई है। अब कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी कितना असर कर रही है। इसके लिए मरीजों को दिल्ली व मुंबई के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। प्रदेश का ये पहला संस्थान है, जहां यह सुविधा उपलब्ध है। जल्द ही इसका औपचारिक लोकार्पण किया जाएगा। वर्तमान में लगभग तीस मरीजों का पेट सीटी किया जा चुका है। इनमें पड़ोसी देश नेपाल से भेजा गया एक मरीज भी शामिल है।
न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के हेड प्रो. एस. गंभीर ने बताया कि पेट सीटी मशीन की कीमत 12 करोड़ रुपये है। इसमें सीटी और पेट स्कैन दो तरह की सुविधाएं होती हैं। सीटी मानव शरीर की आंतरिक तस्वीर लेती है, जबकि पेट (पीईटी-पॉजीट्रॉन इमीशन टोमोग्राफी) शरीर में इंजेक्ट किए गए रेडियो एक्टिव पदार्थ की इमेजिंग करती है। इन दोनों इमेज को एक साथ मिलाकर मरीज के शरीर की असली तस्वीर मिलती है। इससे किसी भी अंग में पनप रहे या फिर फैल चुके कैंसर का पता लग जाता है। प्रो. गंभीर ने बताया कि इस जांच का 9500 रुपये शुल्क लिया जा रहा है। अभी तक पेट सीटी के लिए मरीज को दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल, एम्स दिल्ली, मुंबई के टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के कई चक्कर लगाने पड़ते थे। साथ ही खर्च भी तीन-चार गुना अधिक होता था। अब ये सुविधा पीजीआई में शुरू होने से प्रदेश सहित आसपास के कई राज्यों के मरीजों को कम शुल्क में मिल सकेगी। पेट स्कैन की सुविधा सप्ताह में दो दिन उपलब्ध कराई जाएगी। आने वाले समय में इसे अन्य दिनों में भी बढ़ा दिया जाएगा।
ऐसे पता लगता है कैंसर कोशिकाओं का ः प्रो. गंभीर ने बताया कि रेडियोएक्टिव पदार्थ एफ-18 को फ्लोरो डीऑक्सी ग्लूकोज (एफडीजी) के साथ मिलाकर मरीज को इंजेक्शन से दिया जाता है। ये शरीर में खून के साथ फैल जाता है। इसके बाद कोशिकाएं इसको ग्रहण करने लगती हैं। असामान्य या कैंसरग्रस्त कोशिकाएं ग्लूकोज को अधिक मात्रा में ग्रहण कर लेती हैं। ग्लूकोज के साथ रेडियोएक्टिव पदार्थ भी इन कोशिकाओं में चला जाता है। पेट सीटी स्कैन में कोशिकाओं के अंदर जमा यही रेडियोएक्टिव पदार्थ पीला-पीला चमकता हुआ दिखता है। इसे देखकर चिकित्सक कैंसर व उसके फैलाव का पता लगा लेते हैं।
ये है पूरी प्रक्रिया ः एफ-18 नाम का रेडियोएक्टिव पदार्थ मुंबई से हवाई जहाज से पीजीआई के न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग पहुंचता है, जहां इसे लैब में मरीजों को इंजेक्शन से देने की प्रक्रिया शुरू की जाती है। मात्र तीन घंटे तक ही एक्टिव रहने के कारण प्रक्रिया मिनट दर मिनट पूरा की जाती है। ताकि उसका रेडिएशन खत्म न हो। इसके बाद एफ-18 को एफडीजी के साथ मिलाकर मरीज को इंजेक्ट करते हैं। इसके बाद मरीज को एक घंटे तक ऐसे कमरे में रखा जाता है, जहां से विकिरण बाहर न निकले। शरीर में एफडीजी फैलने के बाद मरीज का पेट सीटी स्कैन किया जाता है। इसमें 30 मिनट लगता है। इसके बाद मरीज को एक घंटे तक फिर उसी कमरे में रखा जाता है, जहां उसे इंजेक्शन लगाने के बाद रखा गया था। ताकि रेडियोएक्टिव पदार्थ पूरी तरह से निष्क्रिय हो जाए और किसी अन्य को विकिरण न लगे।