लखनऊ। लिटरेरी फेस्टिवल के दूसरे दिन फिल्म व साहित्य के दिग्गजों ने भारतीय सिनेमा के सौ साल के सफर का खाका खींचा। इस बहाने फिल्मों में लखनऊ और अवध के योगदान की भी चर्चा हुई। फिल्मकारों ने माना कि समकालीन सिनेमा में भी अवध व यूपी के रंग अलग-अलग तरीकों से उभरते व दिखते हैं हालांकि वह पहचान से नहीं जुड़ पाते। चर्चा के दौरान सौ करोड़ कमाई के ट्रेंड पर भी सवाल उठे और कहा गया कि इसमें फिल्में कम और मसाला ज्यादा है।
संचालक की जिम्मेदारी संभाल रहे लेखक यतींद्र मिश्र ने मुजफ्फर अली से सवाल किया कि आपकी फिल्मों में फैज, जयदेव, गुलाम मुस्तफा जैसे संगीतकार थे। अब फिल्मों में ऐसा गीत-संगीत क्यों नहीं है जो कुछ देर तक जुबां और दिल में ठहर सके? अली का जवाब था कि जब तक फिल्म बनाने वाला जड़ से नहीं जुड़ेगा, तब तक वह असली फिल्म नहीं बना सकता। दुनिया हकीकत देखना चाहती है और हकीकत जड़ों में ही होती है। हाईब्रिड फिल्में ग्लोबल नहीं हो सकतीं। केवल मजे के लिए फिल्म बनाने से बेहतर है कि कोई दूसरा पेशा तलाश लें। हमारे पास पहले से ही रागों, साजों व अल्फाजों की इतनी बड़ी विरासत है कि इन्हें कोई करीने से फिल्म में सजा ले तो पर्दा फाड़ दे। लेखक व अभिनेता अतुल तिवारी ने लखनऊ व सिनेमा के रिश्तों के तार छेड़े। उन्होंने कहा कि ‘उमराव जान’ से ‘अंजुमन’ तक फिल्मों में लखनऊ उतरा। इन फिल्मों में अवध की तहजीब व संस्कृति को जगह मिली। आज लखनऊ में ‘इशकजादे’ और ‘दबंग’ जैसी फिल्मों की शूटिंग तो होती है लेकिन फिल्मकार उसमें लखनऊ दिखाने से परहेज करते हैं। इनमें महज यहां की दीवारें ही नजर आती हैं। वहीं लखनऊ में न बनने के बावजूद ‘गंगा-जमुना’ और ‘लगान’ जैसी फिल्मों में अवध की बोली और संस्कृति की छाप दिखाई पड़ती है।
कला से बड़े हो गए स्पांसर
लेखक आसिफ रजा ने कहा कि 40 के दशक में लखनऊ में फिल्म स्टूडियो खुला था। दरअसल अवध और उत्तर प्रदेश फिल्मों में बड़े पैमाने पर दिखता है लेकिन यूपी की पहचान, भाषा और पहनावा राष्ट्रीय पहचान है। ऐसे में बंगाली, पंजाबी या अन्य क्षेत्र विशेष के रूप में यहां की कोई अलग पहचान नहीं दिख पाती। इसके फायदे भी हैं और नुकसान भी। उन्होंने कहा कि सौ करोड़ कमाने वाले फिल्मों में एकाध को छोड़ दिया जाए तो वे मार्केटिंग प्लान और रिंगटोन से आगे नहीं बढ़ सकी हैं। निर्देशक अमित राय ने सिनेमा से गायब होते असली मध्य वर्ग का सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि अब फिल्मों में होली-दिवाली भी लंदन की दिखाई जाती है और पहने जाने वाले लहंगे 50 हजार से कम के नहीं होते। जब स्पांसर कला से बड़े हो जाएंगे तो ऐसा होना ही है। अमित ने कहा कि फिल्म वह है जो देखने के बाद सोचने पर मजबूर करे लेकिन आज की फिल्मों में कुछ ऐसा दिखता ही नहीं है। यतींद्र ने भी कजरी जैसी लोकगीतों के जरिए सिनेमा में अवध की उपस्थिति की बात उठाते हुए कहा कि इसे दिखाया और फिल्माया गया लेकिन श्रेय नहीं दिया गया।