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‘जबरन दवाएं खिलाकर टीबी को दवा प्रतिरोधी बना दिया’

Tue, 19 Mar 2013 05:30 AM IST
Lucknow
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लखनऊ। ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता है कि ट्यूबरक्लोसिस में मल्टीपल ड्रग्स रजिस्टेंस (एमडीआर) की वजह दवाएं लिखने के पैटर्न से पैदा हुई है। हमारे यहां किसी व्यक्ति के फेफड़ों की एक्स-रे रिपोर्ट में धब्बे दिखे नहीं कि डॉक्टर उस व्यक्ति को टीबी की दवा देना शुरू कर देते हैं। जबकि एक्स-रे रिपोर्ट में आए धब्बे कभी इस बात का पुख्ता सबूत नहीं हो सकती कि व्यक्ति को टीबी है। यह बात केजीएमयू के पल्मोनरी मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. सूर्य कांत ने दी। वे सोमवार को डॉ. राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के माइक्रोबायोलॉजी विभाग की ओर से आयोजित ‘अपडेट ऑन ट्यूबरक्लोसिस’ सिंपोजियम में बोल रहे थे। पल्मोनरी टीबी पर व्याख्यान देते हुए डॉ. सूर्य कांत ने बताया कि देश की 40 प्रतिशत आबादी टीबी में एक्सपोज हुई है। शुरुआत संक्रमण 90 प्रतिशत मामलों में व्यक्ति की शारीरिक क्षमता के चलते ठीक हो जाते हैं जबकि 10 प्रतिशत को जीवन में कभी टीबी विकसित होने की संभावना रहती है, लेकिन जो लोग शुरुआती टीबी से रिकवर हो चुके होते हैं, उनके फेफड़ों में भी वे धब्बे पाए जा सकते हैं जो टीबी संक्रमित व्यक्ति के फेफड़ों में होते हैं। अधिकतर डॉक्टर सिर्फ एक्स-रे रिपोर्ट देखकर ही लोगों को टीबी की दवाएं लिख रहे हैं और टीबी की वजह बनने वाले सूक्ष्म जीवी इन दवाओं के प्रति प्रतिरक्षण प्रणाली विकसित कर रहे हैं। इससे टीबी से भी ज्यादा जटिल स्थिति एमडीआर-टीबी पैदा हो रही है। डॉ. सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि चिकित्सक एक्स-रे रिपोर्ट को ट्रीटमेंट का आधार न बनाएं बल्कि संदेह होने पर विस्तृत जांच की सिफारिश करें। साथ ही उन्हाेंने उत्तर प्रदेश में सिर्फ विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा ही टीबी की दवाएं देने का नियम बनाने की जरूरत बताई। इससे पूर्व सिंपोजियम के मुख्य अतिथि टीबी कंट्रोल के नेशनल टास्क फोर्स चेयरमैन प्रो. डी बहेरा, प्रमुख सचिव डॉ. हरशरण दास सहित विभिन्न अतिथियों ने आयोजन का शुभारंभ किया। संस्थान के निदेशक प्रो. एमसी पंत और डीन प्रो. नुजहत हुसैन ने सभी अतिथियों का अभिनंदन किया। प्रो. बहेरा ने ट्यूबरक्लोसिस में ड्रग रजिस्टेंस पर मुख्य अभिभाषण दिया। प्रदेश टीबी ऑफिसर व टीबी संयुक्त निदेशक डॉ. सुबोध तिवारी ने टीबी कंट्रोल प्रोग्राम, केजीएमयू में माइक्रोबायोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. अमिता सिंह ने टीबी की जांच में नई तकनीकों सहित पीजीआई के डॉ. राजा रॉय, डॉ. एके त्रिपाठी, डॉ. यूसी घोषाल और डॉ. आरके गर्ग ने टीबी से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपनी बात रखी। आयोजन सचिव डॉ. विनीता मित्तल ने कार्यक्रम के समापन पर सभी का आभार जताया।
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‘अब कराइए दो घंटे में टीबी का टेस्ट’ ः सिंपोजियम में टीबी कंट्रोल के नेशनल टास्क फोर्स चेयरमैन प्रो. डी बहेरा ने पत्रकारों से बातचीत में बताया कि देश में इस वक्त टीबी-एमडीआर के करीब 6.40 लाख मामले सामने आ चुके हैं। उत्तर प्रदेश में हालांकि अभी इसके लिए एक विस्तृत सर्वे कराए जाने की जरूरत है। इसके कंट्रोल प्रोग्राम पर उन्हाेंने कहा कि देश के 24 राज्यों में इसे पूरी तरह लागू किया जा चुका है। उत्तर प्रदेश में शुरुआत चूंकि देर से हुई थी, अभी यह लखनऊ और आसपास के 7 जिलों में शुरू हो सका है। जल्द ही 20 जिलों तक इसे ले जाया जाएगा। प्रो. बहेरा ने बताया कि टीबी के लिए डॉट्स की उपलब्धता सुनिश्चित करने में सरकार पूरे प्रयास कर रही है। फिलहाल एक प्रस्ताव यह भी आया है कि डॉट्स को निजी कैमिस्टों के जरिए मरीजों तक पहुंचाया जाए, हालांकि ऐसे प्रस्ताव की उपयोगिता पर अभी अभी विस्तृत चर्चा बाकी है, इसकी सहमति बनी तो जल्द इसे जारी किया जाएगा। उन्हाेंने बताया कि निजी चिकित्सकों के पास अब भी टीबी के करीब 40 प्रतिशत मरीज जा रहे हैं, जिनकी रिपोर्ट सरकार तक पहुंचाने के लिए सभी चिकित्सकों को नोटिफिकेशन जारी करके सूचित किया गया है। टीबी की जांच में मेडिकल एडवांसमेंट को उन्हाेंने इसके नियंत्रण में प्रमुख अस्त्र बताया। प्रो. बहेरा ने बताया कि स्लाइड कल्चर के जरिए पुरानी जांच में कम से कम छह सप्ताह बाद रिपोर्ट आती थी, लेकिन अब लाइन प्रोब ऐसे (एलपीए) और जीन एक्सपर्ट तकनीकें अपनाई जाने लगी हैं, जो ज्यादा उपयोगी हैं। जीन एक्सपर्ट तकनीक के जरिए सिर्फ 2 घंटे में जांच रिपोर्ट मिल जाती है। प्रदेश में सरकारी स्तर पर इन तकनीकों को लागू किया जा रहा है।
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