लखनऊ। जस्टिस वर्मा कमेटी ने अपनी सिफारिशों में शादीशुदा महिला से उसके पति द्वारा जबरन बनाए गए संबंध को दुराचार मानने की भी की थी, लेकिन केंद्र सरकार ने हालिया जारी महिला हिंसा रोकथाम अध्यादेश में इसे जगह ही नहीं दी। कुछ नेता और समाज के तथाकथित रक्षक कह रहे हैं कि इसे कानूनी अपराध करार देने से कई घर टूटेंगे, लेकिन हिंसा से घर नहीं बचाए जाते, घर प्रेम के आधार पर चलाए और बचाए जाते हैं। अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति (एडवा) की उपाध्यक्ष सुभाषिनी अली ने इस तर्क के साथ केंद्र सरकार के अध्यादेश की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि आज दुनिया भर का पॉर्न लोगों की पहुंच में आ गया है। महिला संगठनों के पास कई मामले आ रहे हैं, जहां इन्हें देखकर पति अपनी पत्नी को अप्राकृतिक संबंध के लिए मजबूर करता है। पत्नी का अपने शरीर पर अधिकार होना चाहिए। इसमें सख्त कानून उनकी मदद करेगा। सोमवार को जयशंकर प्रसाद सभागार में एडवा द्वारा एक विचारमंच में सुभाषिनी अली ने यह बात कही। इसमें शहर की विभिन्न महिला संगठन शामिल हुईं। इसमें जस्टिस वर्मा की सिफारिशों का समर्थन और उन्हें नजरअंदाज कर लाए गए अध्यादेश की आलोचना की गई। सुभाषिनी अली ने जस्टिस वर्मा की सिफारिशों को गिनाते हुए कहा कि ये गैर जरूरी रूढ़िवादिता को तोड़ने में समक्ष हैं जबकि केंद्र सरकार के अध्यादेश को पुरुष श्रेष्ठतावादी मानसिकता से ग्रस्त पार्टियां और समूह समर्थन कर रहे हैं। उन्हाेंने अध्यादेश लाने में हुई जल्दबाजी को संदेहास्पद बताया। महिला संगठनों ने इस मुद्दे पर जनवरी में विशेष सत्र बुलाने की मांग की थी, तब सरकार ने नहीं सुना था। इससे पहले एडवा की मधु गर्ग ने विचारमंच के आयोजन बारे में बताया। इस मौके पर आशा, रेणु, ऋचा, आदिति आदि महिला एक्टिविस्ट्स व विधि जानकार सहित बड़ी संख्या में महिलाएं मौजूद रहीं।
‘दुराचारियों को फांसी’ आशियाना कांड पीड़िता की अपील
आशियाना सामूहिक दुराचार कांड पीड़िता सकीना (नाम परिवर्तित) ने माइक पर आकर अपनी बात रखी। सकीना ने दुराचार व हत्या जैसे मामलों में दोषी होते हुए भी नाबालिगों को सजा नहीं होने पर नाराजगी जताई। उसने कहा कि नाबालिग दुराचार करने की सोच सकता है तो उसे नाबालिग क्यों माना जाए। उसने दिल्ली के जघन्य दुराचार कांड के परिप्रेक्ष्य में इस किस्म के मामलों के दोषियों को फांसी या उम्रकैद की मांग की। हालांकि बाकी महिला संगठन दुराचारियों को फांसी की सजा के खिलाफ रहे।
लिंग विशेष पर नहीं कानून : जस्टिस वर्मा रिपोर्ट में समाज में महिलाओं के कमजोर स्थान को देखते हुए उनके प्रति ज्यादा हितैषी कानून बनाने की बात की गई थी। केंद्र के अध्यादेश में इन अपराधों को लैंगिक-निरपेक्ष रखा। पुरुष भी अपने महिला द्वारा दैहिक शोषण का मामला दर्ज करवा सकते हैं। संगठनों ने माना कि पुरुष भी इस किस्म के अपराधों के शिकार होते हैं, लेकिन उनके लिए अलग कानून हो सकता था।
स्पेशल पावर एक्ट को बचाया : सुभाषिनी अली ने कहा कि अशांत इलाकों में आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट लागू है, लेकिन कुछ सैनिकों द्वारा इसका बेजा उपयोग करते हुए इन क्षेत्रों की महिलाओं से दुराचार व उन्हें मारने की घटनाएं सामने आई हैं। ऐसे सैनिकों को सजा देने से सेना का मनोबल कतई नहीं गिरेगा, लेकिन केंद्र सरकार ने इस एक्ट को अध्यादेश में अनछुआ रखा जो नागालैंड, मणिपुर, असम और जम्मू-कश्मीर की महिलाओं के साथ अन्याय है।