सविता पूनिया
- फोटो : Amar Ujala
टोक्यो ओलंपिक में भारतीय हॉकी ने एक बार फिर दुनिया के सामने अपना लोहा मनवाया। पुरुष हॉकी हो या महिला हॉकी, दोनों के प्रदर्शन से हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। लोगों के मन में एक विश्वास ने जन्म लिया कि अब मेजर ध्यानचंद यानी 'दद्दा' के दौर वाली हॉकी एक बार फिर लौट रही है। 1980 से चला आ रहा इंतजार टोक्यो ओलंपिक में खत्म हुआ, जहां पुरुष हॉकी ने कांस्य पदक जीतकर एक नए दौर की शुरुआत की। महिला टीम के हिस्से में पदक तो नहीं आया, लेकिन अंतिम चार में रहकर उन्होंने भारतीय हॉकी के स्वर्णिम दौर की वापसी की झलक जरूर दिखा दी। इसमें सबसे बड़ा योगदान रहा गोलकीपर और ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया के नाम से मशहूर सविता पूनिया का। उन्होंने अमर उजाला से खास बातचीत में अपने करियर के संघर्ष और कुछ अनसुने अनुभव साझा किए। आइए जानते हैं सविता के बारे में उन्हीं की जुबानी...
सवाल- मुझे हॉकी ही खेलनी है। यह ख्याल कैसे आया?
मेरा हॉकी का सफर संघर्ष से भरा रहा है। मध्यमवर्गीय परिवार से आने की वजह से हर चीज काफी सोच समझ कर करनी पड़ती थी। हालांकि, मैं इस मामले में खुद को किस्मत वाली मानती हूं कि मुझे अपने परिवार को मनाना नहीं पड़ा। उन्होंने खुद मुझे हॉकी में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। शुरुआत करना तो आसान होता है। कोई न कोई रास्ता तो मिल ही जाता है, लेकिन असली परीक्षा उस वक्त शुरू होती है, जब आप आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं।
सवाल- आपने शुरुआत डिफेंडर के तौर पर की थी। फिर गोलकीपर कैसे बनीं?
मैंने जब खेलना शुरू किया, तो मैं डिफेंडर थी। करीब डेढ़ साल तक मैंने डिफेंडर के तौर पर टीम में जगह बनाई। इसके बाद मेरे पहले कोच सुंदर सिंह खरब ने पापा से बोला कि इसकी हाइट अच्छी है, इसे गोलकीपर बना सकते हैं। ये आगे जाकर जरूर इंडिया के लिए खेलेगी। यहीं से मेरे गोलकीपर बनने का सफर शुरू हुआ।
सवाल- कोई भी खिलाड़ी ऐसे ही बड़ा नहीं बनता। इसके लिए काफी संघर्ष से गुजरना पड़ता है। अपने संघर्ष के बारे में कुछ बताइए।
2003-04 की बात है ये। जब मैंने खेलना शुरू किया, तब मेरी मां को गठिया की समस्या थी। ऐसे में खेल के दौरान मेरे मन में मां, परिवार की बात चलती रहती थी। मुझे लगता था कि मां को मेरी जरूरत है। मैं यहां खेल रही हूं और वहां मेरा भाई और मेरे पापा घर के काम कर रहे हैं। डेढ़ साल तक तो मैं इसी सोच में रही। इसके बाद सुंदर सर ने पापा से मुझे गोलकीपर बनाने की बात की और उन्होंने मुझे इसी पर फोकस रखने को कहा। मम्मी-पापा भी चाहते थे कि मैं स्पोर्ट्स पर ध्यान लगाऊं।
जैसा कि मैंने बताया कि हम मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं। गोलकीपर बनने का तो ठान लिया, लेकिन उसके लिए किट की जरूरत थी। ग्राउंड पर दो किट थीं, जो पहले से बुक थीं, यानी जो गोलकीपर पहले से प्रैक्टिस कर रहे थे, वे उनका इस्तेमाल कर रहे थे। कोच ने बोला कि अगर ग्राउंड से किट चाहिए, तो एक साल इंतजार करना पड़ेगा। ऐसे में मेरे पापा ने मुझे नई किट लाकर दी। 2003 में उस किट की कीमत 18 हजार रुपये थी और पापा हर महीने सिर्फ नौ हजार रुपये कमाते थे। इसलिए मैं आज जहां भी हूं, उसमें मेरे परिवार का योगदान सबसे ज्यादा है। यही सब सोचकर मैंने तय किया कि अब हॉकी पर ही फोकस करना है।
सवाल- कहते हैं कि आपके दादाजी चाहते थे कि आप हॉकी खेलें और उनके कहने पर ही आपने इस खेल को चुना?
हॉकी खेलने का फैसला भी अचानक ही किया। इसमें मेरे दादाजी का सबसे बड़ा योगदान रहा। उन्होंने ही मुझसे कहा था कि आप हॉकी ही खेलोगे। सिरसा के स्कूल में तीन खेलों के ट्रायल चल रहे थे- बैडमिंटन, हॉकी और जूडो। मैंने दादाजी को बताया कि कल मैं स्पोर्ट्स के लिए ट्रायल देने जा रही हूं। इस पर उन्होंने पूछा कि कौन-कौन से खेल हैं। मैंने तीनों के नाम बताए, तो उन्होंने कहा कि हॉकी। यहीं से मेरा हॉकी का सफर शुरू हुआ। उस वक्त मुझे हॉकी के बारे में कुछ भी नहीं पता था। मैं हॉकी के नियम-कायदे कुछ नहीं जानती थी। स्पोर्ट्स के नाम पर क्रिकेट जरूर कभी-कभी देख लिया करती थी, लेकिन हॉकी से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था। पर दादाजी ने कहा तो तय कर लिया कि हॉकी ही खेलनी है। बेमन से दिए ट्रायल में हॉकी हाथ आई थी, फिर यही जुनून बन गई।
सवाल- आप अपना रोलमॉडल किसे मानती हैं?
मैं हमेशा अपने पापा और दादाजी को फॉलो करती रही हूं। पापा मुझे हमेशा दादाजी के उदाहरण दिया करते थे। इसलिए मैं हमेशा उनके नक्शेकदम पर चली। उनके दिखाए रास्ते से ही मैं आज कामयाबी हासिल कर पाई हूं। यह संघर्ष भरा रास्ता जरूर रहा, लेकिन आज मैं जहां भी हूं, खुश हूं।
सवाल- छोटे कस्बे से निकलकर कैंप के लिए जाना काफी मुश्किल होता होगा। इस बारे में कुछ बताइए।
मैं हरियाणा से आती हूं। सोचिए उस वक्त हरियाणा की लड़की को हॉकी खेलने के लिए कौन सपोर्ट करेगा और मैं थोड़ी संकोची स्वभाव की थी। सार्वजनिक स्थलों पर असहज महसूस करती थी। सोचिए जरा उस वक्त इतनी भारी गोलकीपिंग किट के साथ दूर-दूर यात्रा करना कितना मुश्किल होता होगा। सिरसा से दिल्ली जाना होता था। हमारे पास ज्यादा सुविधाएं नहीं थीं। खुद की गाड़ी भी नहीं थी। बस से सफर करना पड़ता था। कई बार बस ड्राइवर और कंडक्टर किट देखकर डबल किराया मांगते थे। कई बार बस के ऊपर किट रखने को बोलते थे। कमेंट भी करते थे। उस वक्त भी लगता था कि क्या होगा आगे? कैसे आगे बढ़ेंगे? कई बार ये सब छोड़ने का मन किया। घर पर पापा से भी इस बारे में बात की। फिर उन्होंने समझाया कि इन सब बातों पर ध्यान मत दो। अपने खेल पर ध्यान दो।
सवाल- आपकी जिंगदी का कोई ऐसा पल, जिसे आप कभी नहीं भूल पाएंगी।
मेरे दादाजी को मुझ पर बहुत गर्व था। मै स्टेट लेवल पर खेल रही थी। शाहाबाद से मेरा मैच था। शाहाबाद काफी अच्छी टीम मानी जाती है। हम अक्सर उनसे बड़े अंतर से हारते थे, लेकिन जब मैंने अपना पहला मैच खेला, तो हमने उन्हें कड़ी टक्कर दी। इसके बाद विरोधी टीम के कोच ने मुझे 100 रुपये इनाम में दिए और बोले कि अच्छा खेली तुम। मैं घर आई और दादाजी को यह बात बताई। वो बहुत खुश हुए। एक वाकया और बताती हूं। 2007 में मेरा चयन नेशनल कैंप के लिए हुआ। इसके एक साल के बाद मुझे नेशनल टीम के लिए चुना गया। उस दौरान मेरा एक आर्टिकल अखबार में छपा था। उसमें मैंने दादाजी के बारे में बताया था तो उन्होंने कहा कि जब भी घर आएगी तेरे सामने ही इसे पढ़कर सुनाऊंगा। मुझे लगा कि दादाजी ऐसे ही बोल रहे होंगे। मैं जब घर आई तो उन्होंने मुझे सामने बैठाकर वो खबर पढ़ी और उनकी आंखों में खुशी के आंसू थे।
सवाल- ओलंपिक में शुरुआती तीन मैच हारने के बाद आपने और टीम ने अपना हौसला कैसे बनाए रखा?
सविता पूनिया
- फोटो : अमर उजाला
खेल में आप कभी भी हार नहीं मान सकते। जीत हो या हार, हर परिस्थिति में हमें लड़ना होता है। पहले मैच में हॉलैंड ने हमें 5-1 से हराया। फिर भी यहां हमारी परफॉर्मेंस बुरी नहीं थी। स्कोर पूरी कहानी बयां नहीं करते। हम मैच जरूर हारे, लेकिन मैच के बाद हॉलैंड के प्लेयर हमसे आकर बोले कि हमने अच्छा खेल दिखाया। हम उनसे हमेशा 8-0 या 9-0 से हारते थे, पर इस बार हमने उन्हें टक्कर दी। यही हमारे लिए प्लस पॉइंट था। दूसरे मैच में जर्मनी के खिलाफ भी अच्छा खेले, लेकिन जीत नहीं पाए। हां, तीसरे मैच में हम अच्छा नहीं खेले। ब्रिटेन के खिलाफ हमारा प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं था। इस पर हमारे कोच शोर्ड मारिन काफी नाराज हुए। उन्होंने हमसे कहा कि आप लोगों को अंदाजा भी नहीं है कि आप क्या हाथ से जाने दे रहे हो। मुझे पता है कि आपमें क्षमता है, बस आप उसे पहचानने में देरी न करें। इसी वक्त से हमारे लिए सब कुछ बदल गया।
सवाल- आपकी तुलना श्रीजेश से की जा रही है। आपको कैसा लगता है ये?
श्रीजेश भैया के साथ मैं काफी समय बिताती हूं। बेंगलुरु में हम एक-दूसरे से चर्चा करते रहते हैं। उनसे मैंने काफी कुछ सीखा है। अभी भी सीख रही हूं। वे बहुत बड़े खिलाड़ी हैं। धीरे-धीरे लोगों के हॉकी देखने का नजरिया बदल रहा है। अब हॉकी गोलकीपर पर ज्यादा डिपेंड करती है और लोग भी इस पर ध्यान दे रहे हैं। हमने गोलकीपिंग के लिए एक्स्ट्रा सेशन लिए और इसी का फायदा मुझे ओलंपिक में मिला।
सवाल- क्या आपको लगता है कि देश में हॉकी का स्वर्णिम दौर लौट आया है?
यह बात सही है कि हॉकी का प्रदर्शन सुधरा है। हम पुराने दौर की ओर बढ़ रहे हैं। मुझे पूरी उम्मीद है कि आने वाले समय में भारतीय हॉकी दुनिया में देश का परचम लहराएगी। टोक्यो से हम सकारात्मक परिणाम लेकर लौटे हैं। आने वाले दिनों में इसे और आगे लेकर जाएंगे। टोक्यो में हमने जो किया, वो एक शुरुआत है। हमने सफलता के रास्ते पर चलना शुरू कर दिया है। पेरिस ओलंपिक में हम नया इतिहास रचेंगे।
सवाल- प्रधानमंत्री मोदी ने टीम से मुलाकात की थी। उनका हॉकी के लिए कोई खास संदेश।
प्रधानमंत्री जी का साफ कहना था कि मेडल अपनी अपनी जगह है, लेकिन हॉकी की बात ही कुछ और है। उसकी जगह देश के लिए खास है। जब तक हॉकी में हमारा प्रदर्शन अच्छा नहीं होता, तब तक मजा नहीं आता। उन्होंने हमारा हौसला बढ़ाया। उन्होंने कहा कि आपने मेडल नहीं जीता, लेकिन करोड़ों भारतीयों के दिल पर आज आपने अपनी छाप छोड़ी है।
सवाल- आपका अगला गोल क्या है? आप अपने करियर में क्या हासिल करना चाहती हैं?
मुझमें इस वक्त बहुत एनर्जी है। अगर मैं कहूं कि मैं इस वक्त सबसे शानदार फॉर्म में हूं, तो गलत नहीं होगा। ऐसे में आने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स, वर्ल्ड कप और एशियन गेम्स में हमारी टीम शानदार प्रदर्शन करेगी। एशियन गेम्स में गोल्ड जीतकर हम ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करना चाहेंगे। हम इस बार ओलंपिक के टॉप-4 में रहे। हमने बहुत पास आकर मेडल मिस किया है, उस दर्द को हम कभी नहीं भूलेंगे। ऐसे में पेरिस में हमसे उम्मीदें ज्यादा होगी। वहां स्वर्ण जीतकर हम मेजर ध्यानचंद के दौर वाली हॉकी को एक बार फिर देश में वापस लाएंगे।
सवाल- शोर्ड मारिन अब टीम इंडिया के साथ नहीं हैं। इस पर आप क्या कहना चाहेंगी?
वो एक शानदार कोच हैं। उन्हें हम पर पूरा भरोसा था। उन्होंने करीब साढ़े चार साल हमारे साथ बिताए। हम तो चाहते थे कि वो आगे भी हमारे साथ रहें, लेकिन उनके परिवार को भी उनकी जरूरत है। जब ओलंपिक एक साल के लिए टला, तो उनके लिए परिवार से दूर रहना बहुत मुश्किल था। फिर भी उन्होंने अपना काम बखूबी किया। परिवार की जरूरत को हम खिलाड़ी अच्छे से समझ सकते हैं। इसलिए उनके फैसले का सम्मान करते हैं।
सवाल- आपको देखकर देश की लड़कियां हॉकी खेलने के लिए प्रेरित हो रही हैं। उनके लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगी?
ऐसी लड़कियां जो हॉकी में अपना करियर देख रही हैं, उन्हें धैर्य और कड़ी मेहनत पर ध्यान देना चाहिए। सफलता आसानी से नहीं मिलती। इसके लिए कई चीजें कुर्बान करनी पड़ती हैं। जरूरी नहीं कि सब कुछ आपके हिसाब से हो। हो सकता है कि आपको कुछ देरी से मौका मिले, लेकिन आपको हौसला नहीं हारना है। मेहनत करते रहना है।