स्वर्ण पदक के साथ भारतीय भाला फेंक एथलीट नवदीप
- फोटो : यूट्यूब वीडियो ग्रैब- Paralympic Games
भाला फेंक एफ41 वर्ग में स्वर्ण पदक जीतने वाले भारतीय पैरा एथलीट नवदीप सिंह का दर्द छलका है। उन्होंने अपने जैसे पैरा खिलाड़ियों के लिए उस तरह की सम्मान की मांग की है जैसा कि सामान्य खिलाड़ियों को मिलता है। छोटे कद से पीड़ित नवदीप को हरियाणा के पानीपत जिले में अपने गांव में प्रशिक्षण की सामान्य कठिनाइयों के साथ लोगों के क्रूर तानों का भी सामना करना पड़ता था।
नवदीप के रजत को स्वर्ण में बदला गया
पेरिस खेलों में ट्रैक एवं फील्ड प्रतियोगिताएं समाप्त हो गई और फाइनल में नवदीप के सुनहरे थ्रो ने स्टेड डी फ्रांस में भारतीय राष्ट्रगान के गूंजने को सुनिश्चित किया। नवदीप 47.32 मीटर के अपने सर्वश्रेष्ठ प्रयास के साथ दूसरे स्थान पर थे लेकिन ईरान के बेत सयाह सादेघ को अयोग्य घोषित किए जाने के बाद उनके रजत पदक को स्वर्ण में बदल दिया गया। सयाह को बार-बार आपत्तिजनक झंडा प्रदर्शित करने के लिए अयोग्य घोषित किया गया। वह अपनी हरकतों से स्वर्ण पदक गवां बैठे।
भारतीय पैरालंपिक समिति (पीसीआई) की ओर से साझा वीडियो में नवदीप ने कहा, हमें भी उतना दर्जा मिलना चाहिए, मैंने भी देश का नाम रोशन किया है। मेरा उद्देश्य समाज को शिक्षित करना है कि हम भी इस दुनिया में मौजूद हैं और किसी को हमारा मजाक नहीं उड़ाना चाहिए, जो अक्सर होता है। हम भी अपने देश को गौरवान्वित कर सकते हैं। शुरुआत में बहुत सारी बाधाएं थीं लेकिन मैंने अपने खेल को जारी रखने के साथ खुद को मजबूत बनाए रखा। मुझे इसका अच्छा परिणाम मिला। यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा क्षण है, मुझे स्वर्ण पदक जीतने पर गर्व महसूस हो रहा है।
नवदीप का जन्म साल 2000 में समय से पहले हो गया था। जब वह दो साल के थे तब उनके माता-पिता को अहसास नहीं हुआ कि उनके बेटे में बौनापन है। उनके पिता, दलबीर सिंह राष्ट्रीय स्तर के पहलवान थे और उन्होंने खेलों में आगे बढ़ने के लिए अपने बेटे का पूरा समर्थन किया। नवदीप ने 10 साल की उम्र में अपनी एथलेटिक यात्रा शुरू की। राष्ट्रीय नायक नीरज चोपड़ा से प्रेरित होने के बाद भाला फेंक में पहचान पाने से पहले उन्होंने कुश्ती और दौड़ में हाथ आजमाया।
नवदीप ने कहा, पहली चीज जो मेरे दिमाग में आती है वह मेरे पिता दलबीर सिंह हैं। मुझे अब अपने परिवार की बहुत याद आती है। शुरू में यह एक बोझ की तरह लगता था। मुझे आश्चर्य हुआ कि मैं दूसरों की तरह जीवन का आनंद क्यों नहीं ले सकता जैसा कि स्कूल जाना और पढ़ाई करना। मेरे पिता ने मुझे खेलों के लिए प्रेरित किया और ट्रैक पर बनाए रखा। इस यात्रा में मैं सिर्फ एक व्यक्ति को श्रेय नहीं दे सकता। चैंपियन समर्थन से बनते हैं, इसलिए मेरे कोच, मेरे परिवार, सरकार, इन सभी ने हमारी सफलता में योगदान दिया। हमने 25 पदकों की उम्मीद की थी लेकिन यह संख्या 29 तक पहुंच गई।
नवदीप ने अपनी इस सफलता के लिए दिग्गज पैरा खिलाड़ी और भारतीय पैरालंपिक समिति के अध्यक्ष देवेंद्र झाझड़िया को भी श्रेय दिया। उन्होंने कहा, झाझड़िया के पास बहुत अनुभव है, और वो हमेशा फंसे हुए मैच निकालने में सफल रहे हैं, इसलिए मैंने उनसे अपनी समस्या साझा की। उन्होंने एक छोटी सी सलाह दी लेकिन अंत में पता चला सच में ये तो बहुत जरूरी पहलू है।