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अवनि लेखरा का संघर्ष: 12 साल की उम्र में हुआ पैरालिसिस, नहीं मानी हार, अब शूटिंग में गोल्ड जीत रचा इतिहास

Mon, 30 Aug 2021 09:09 AM IST
संजीव कुमार झा स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

टोक्यो पैरालंपिक्स में भारत की अवनि लेखरा ने शूटिंग में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया है। आइए जानते हैं उनके संघर्ष की कहानी।  
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अवनि लेखरा - फोटो : facebook
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विस्तार
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टोक्यो पैरालंपिक्स में भारत की अवनि लेखरा ने शूटिंग में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया है। उन्होंने महिलाओं की 10 मीटर एयर स्पर्धा एसएच-1 में यह स्वर्ण पदक जीता। टोक्यो पैरालंपिक में भारत का यह पहला स्वर्ण पदक है। आपको बता दें कि अवनि को यह जीत इतनी आसानी से नहीं मिली है। इस मुकाम पर पहुंचने के लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा है। आइए जानते हैं अवनि के संघर्ष की कहानी...

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वर्ष 2012 में महज 12 साल की उम्र में अवनि लेखरा की जिंदगी उस समय बदल गई जब एक दुर्घटना के चलते उन्हें पैरालिसिस का शिकार होना पड़ा और चलने के लिए व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ गया। लेकिन अवनि ने हार नहीं मानी और आगे बढ़ने को ठान लिया। दुर्घटना के महज तीन साल बाद ही अवनी ने शूटिंग को अपनी जिंदगी बनाया और महज पांच साल के भीतर ही अवनी ने गोल्डन गर्ल का तमगा हासिल कर लिया।

दुर्घटना के बाद  हो गई थीं बेहद कमजोर
अवनि के पिता प्रवीण बताते हैं कि दुर्घटना के बाद गुमशुम रहने लग गई थी। किसी से बात नहीं करती थी, पूरी तरह डिप्रेशन में चली गई थी। उन्होंने कहा कि भीषण दुर्घटना के कारण इसकी पीठ पूरी तरह काटनी पड़ी। इतनी कमजोर हो गई थी कि कुछ कर नहीं पाती थी। यहां तक की कोई हल्का सामान भी उठाना मुश्किल हो रहा था।
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पैरालिसिस के बाद काफी टूट गई थीं अवनि
अवनि के माता-पिता ने कहा कि 12 साल की उम्र में जब अवनि को पैरालिसिस हुआ तो वह काफी टूट गई थीं। उस समय सोचा की अवनी  को किसी खेल से जोड़ा जाए और काफी सोच-विचार के बाद मैंने इसे शूटिंग में हाथ आजमाने को कहा। अवनि के पिता ने कहा कि शूटिंग में पहली बार तो इससे गन तक नहीं उठी थी, मगर आज इसकी वजह से टोक्यो पैरालिम्पिक के पोडियम पर राष्ट्रगान गूंजेगा। खेल के साथ ही अवनी पढ़ाई में भी काफी होशियार हैं। इसके साथ ही अन्य क्रियाकलाप में भी अवनी सबसे अव्वल रहती हैं।

मन बहलाने के लिए शूटिंग रेंज घुमान लेकर गए पिता, वहीं से अवनि की रुचि जगी
अवनि के पिता ने बताया कि दुर्घटना के बाद जब यह परेशान रहने लगी थी तब मन बहलाने के लिए इसे शूटिंग रेंज लेकर गया था। यहीं से अवनि में रुचि जगने लगी।    अवनि ने शूटिंग को अपनी जिंदगी बना ली। वह इसके लिए तबतक मेहनत करती रहती थीं जब तक कि थक कर चूर न हो जाए।  

कोरोना काल रहा मुश्किल भरा
कोरोना के चलते अवनि को पिछले दो सालों से काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इस दौरान उनकी प्रैक्टिस पर भी काफी असर पड़ा। लेकिन उनके पिता ने घर में टारगेट सेट कर अवनी की प्रैक्टिस में कोई कसर नहीं छोड़ी। पैरालंपिक की तैयारी कर रही अवनि घर पर ही टारगेट पर प्रैक्टिस कर रही थीं साथ ही उस समय उनका गोल्ड पर निशाना साधना ही लक्ष्य था। इसके लिए वो नियमित रूप से जिम और योगा पर ध्यान दे रही थीं। उन्होंने फिट रखने के लिए खान-पान का विशेष रूप से ध्यान रखा।

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