भारत ने आजादी के बाद से अब तक खेलों में बहुत तरक्की की है लेकिन आजादी के 70 साल बाद भी ये प्रयास विश्व स्तर पर खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए नाकाफी हैं। बावजूद इसके भारतीय खेल जगत में कुछ ऐसे सितारे भी उभरे जिनकी उपलब्धियां कभी धूमिल नहीं होंगी। उनकी वजह से आने वाली पीढ़ियों ने खेलों में अपना भविष्य बनाने की प्रेरणा हासिल की।
ऐसी ही एक खिलाड़ी हैं पीटी ऊषा। देश में उड़नपरी के नाम से विख्यात पीटी ऊषा का नाम आज भी लोगों की जुबान पर है। लोगों के जेहन में उनकी यादें आज भी ताजा हैं। उड़नसिख मिल्खा सिख की तरह वो भी ओलंपिक पदक जीतने से सेकेंड के सौवें हिस्से से चूक गईं थी। 1984 के लॉस एन्जेल्स ओलंपिक की 400 मीटर फर्राट दौड़ के सेमीफाइनल में उन्होंने पहला स्थान हासिल किया था। लेकिन फाइनल में हुए कड़े मुकाबले में वो फोटो फिनिश के आधार पर चौथे स्थान पर रहीं और कांस्य पदक उनके हाथ से छिटक गया। लेकिन इस मुकाबले ने उन्हें देश दुनिया में पहचान दिला दी। किसी भी ओलम्पिक प्रतियोगिता के फ़ाइनल में पहुंचने वाली पहली महिला और पांचवी भारतीय एथलीट थीं।
पीटी ऊषा हार मानने वाली खिलाड़ी नहीं थीं। उनके मन में खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने की ललक थी। ओलंपिक में मिली निराशा को अपनी ताकत बनाकर पीटी ऊषा 1985 में इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में आयोजित एशियाई चैंपियनशिप में 5 स्वर्ण और 1 कांस्य सहित कुल 6 पदक हासिल किए था। उनकी इस उपलब्धि की बराबरी आजतक कोई भारतीय नहीं कर सका।
ऊषा ने 100m, 200m, 400m, 400m बाधा और 4 गुणा 400 मीटर स्पर्धा में स्वर्ण पदक हासिल किया था। यह उस समय एशियन चैंपियनशिप में किसी महिला खिलाड़ी द्वारा एक स्पर्धा में जीते गए सबसे ज्यादा स्वर्ण पदक थे। 100, 200 और 400 मीटर दौड़ का स्वर्ण पदक उन्होंने नए एशियाई रिकॉर्ड के साथ जीता था। ऊषा ने दो स्वर्ण पदक महज 35 मिनट के अंतराल में जीते थे। 4 गुणा 100 रिले में वह स्वर्ण पदक से चूक गईं। उनकी टीम को कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा था। इस शानदार प्रदर्शन करने के बाद पीटी ऊषा 'उड़नपरी' के नाम से जाना जाने लगा।
ऊषा यहीं नहीं रुकीं 1986 में आयोजित सियोल एशियाई खेलों में ऊषा ने 4 स्वर्ण और एक रजत पदक हासिल किया। उन्होंने इस दौरान जिन स्पर्धाओं में भी भाग लिया सभी में नए एशियाई रिकॉर्ड स्थापित किए। पीटी ऊषा को साल 1984,1985,1986,1987, 1989 में एशिया की सर्वश्रेष्ठ धाविका घोषित किया गया। इसके साथ ही साल 1985 और 1986 में उन्हें दुनिया की सर्वश्रेष्ठ महिला धाविका के पुरस्कार से भी नवाजा गया। वो यह पुरस्कार हासिल करने वाली पहली भारतीय एथलीट थीं।