मीराबाई की तरह लवलीना का भी मां से बेहद लगाव है। भारतीय समय के अनुसार सुबह साढ़े पांच बजे उन्होंने मां को फोन कर आर्शीवाद लिया। उनके पिता टिकेन अमर उजाला से भावुक होकर कहते हैं उन्हें कोई मलाल नहीं है कि उनके बेटा नहीं है। उनकी तीनों बेटियों ने बेटे से बढ़कर फर्ज निभाया है। लवलीना की दो बड़ी जुड़वां बहनें हैं। दोनों मुए थाई की चैंपियन रही हैं। उन्हीं को देखकर लोवलीना ने मुए थाई की, लेकिन 2012 में साई गुवहाटी के कोच पद्म बोरो की नजर उन पर पड़ी और उन्होंने उसे बॉक्सिंग शुरू करा दी। टिकेन को याद है कि मां की तबियत खराब होने पर लवलीना कितना परेशान थीं। उनकी किडनी बदलवाने में 25 लाख का खर्च आया जिसे लवलीना ने वल्र्ड चैंपियनशिप के पदक से जीते कैश अवार्ड से भरा। लवलीना भी कहती हैं कि वह आपरेशन वाले दिन कोलकाता नहीं जा पाई थीं, लेकिन अगले दिन मां से मिलने पहुंच गई थीं।
2012 की जूनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप में स्वर्ण जीतने के बाद राष्ट्रीय कोच द्रोणाचार्य अवार्डी शिव सिंह की उनकी लंबाई देखकर उन्हें राष्ट्रीय शिविर में ले आए। यहां लवलीना रिंग में खुलकर नहीं खेल पाती थीं। कहीं न कहीं उनके मन में डर रहता था। यहीं उन्हें कोच संध्या गुरुंग का साथ मिला। संध्या ने मां की तरह उनका ख्याल रखा और उनके मन से डर को निकाल दिया। संध्या कहती हैं कि वह असली बॉक्सर तब बनीं जब उनके मन से डर निकल गया। लवलीना ने खुद स्वीकार किया कि वह पहले ऐसी नहीं थीं। पहले उनके मन में डर बैठा रहता था।