फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

फर्ज: लवलीना ने पुरस्कार में मिले पैसों से कराया मां का किडनी ट्रांसप्लांट, इलाज के साथ की ओलंपिक की तैयारी

Sat, 31 Jul 2021 09:48 AM IST
Rajeev Rai हेमंत रस्तोगी, नई दिल्ली

सार

  • साथ में चलता रहा मां का इलाज और ओलंपिक की तैयारियां
  • बीते एक साल में बेहद विपरीत परिस्थितियों से गुजरकर ओलंपिक पदक तक पहुंची असम की बॉक्सर
  • पिता ने कहा बेटा होने का कोई मलाल नहीं तीनों बेटियों ने निभाया बेटे का फर्ज
विज्ञापन
लवलीना बोरगेहेन - फोटो : PTI
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

कोरोना के चलते बीते वर्ष लॉकडाउन क्या लगा मानों लवलीना पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। पहले वह खुद संक्रमित हो गईं। 104 फॉरेनहाइट के तपते बुखार में उन्हें एनआईएस पटियाला से दिल्ली लाया गया। उसके बाद उनकी मां की तबियत खराब हो गई। उनका एक पैर राष्ट्रीय शिविर में और दूसरा गुवहाटी में रहता था। डॉक्टरों ने कहा मां की दोनों किडनी खराब हो गई हैं। ट्रांसप्लांट के अलावा कोई चारा नहीं है। इस पर लवलीना ने खुद डोनर (किडनी दान देने वाला ढूंढा) और अपने कैश अवार्ड की राशि लगाकर मां की कोलकाता में किडनी ट्रांसप्लांट कराई। 

विज्ञापन

किडनी पर 25 लाख आया था खर्च

मीराबाई की तरह लवलीना का भी मां से बेहद लगाव है। भारतीय समय के अनुसार सुबह साढ़े पांच बजे उन्होंने मां को फोन कर आर्शीवाद लिया। उनके पिता टिकेन अमर उजाला से भावुक होकर कहते हैं उन्हें कोई मलाल नहीं है कि उनके बेटा नहीं है। उनकी तीनों बेटियों ने बेटे से बढ़कर फर्ज निभाया है। लवलीना की दो बड़ी जुड़वां बहनें हैं। दोनों मुए थाई की चैंपियन रही हैं। उन्हीं को देखकर लोवलीना ने मुए थाई की, लेकिन 2012 में साई गुवहाटी के कोच पद्म बोरो की नजर उन पर पड़ी और उन्होंने उसे बॉक्सिंग शुरू करा दी। टिकेन को याद है कि मां की तबियत खराब होने पर लवलीना कितना परेशान थीं। उनकी किडनी बदलवाने में 25 लाख का खर्च आया जिसे लवलीना ने वल्र्ड चैंपियनशिप के पदक से जीते कैश अवार्ड से भरा। लवलीना भी कहती हैं कि वह आपरेशन वाले दिन कोलकाता नहीं जा पाई थीं, लेकिन अगले दिन मां से मिलने पहुंच गई थीं। 
विज्ञापन

जब लवलीना का डर बन गया ताकत

2012 की जूनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप में स्वर्ण जीतने के बाद राष्ट्रीय कोच द्रोणाचार्य अवार्डी शिव सिंह की उनकी लंबाई देखकर उन्हें राष्ट्रीय शिविर में ले आए। यहां लवलीना रिंग में खुलकर नहीं खेल पाती थीं। कहीं न कहीं उनके मन में डर रहता था। यहीं उन्हें कोच संध्या गुरुंग का साथ मिला। संध्या ने मां की तरह उनका ख्याल रखा और उनके मन से डर को निकाल दिया। संध्या कहती हैं कि वह असली बॉक्सर तब बनीं जब उनके मन से डर निकल गया। लवलीना ने खुद स्वीकार किया कि वह पहले ऐसी नहीं थीं। पहले उनके मन में डर बैठा रहता था।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें