अनुभवी पहलवान विनेश फोगाट ने शनिवार को कहा कि विभिन्न परिस्थितियो में वह 2032 तक प्रतिस्पर्धा कर सकती है क्योंकि उनके अंदर अभी काफी कुश्ती बची है लेकिन उन्हें भविष्य के बारे में नहीं पता है। विनेश ने पेरिस ओलंपिक में 50 किग्रा वर्ग में हिस्सा लिया था और वह फाइनल तक पहुंचने में सफल रही थीं। हालांकि, स्वर्ण पदक मैच से पहले ही उनका वजन निर्धारित सीमा से 100 ग्राम अधिक पाया गया जिस कारण उन्हें अयोग्य करार दिया गया। विनेश ने इसके खिलाफ खेल पंचाट में अपील की थी और संयुक्त रजत पदक देने की मांग की थी, लेकिन खेल पंचाट ने उनकी अपील खारिज कर दी थी जिससे उनका पदक लाने का सपना टूट गया था। विनेश ने अयोग्य करार दिए जाने के बाद संन्यास का एलान कर दिया था। अब उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट डाल अपने संघर्ष को बयां किया। इसके साथ ही विनेश ने बताया कि उन्होंने फाइनल खेलने के लिए प्रयास बंद नहीं किए थे।
'हमने प्रयास बंद नहीं किए थे'
विनेश ने उस दिन का जिक्र किया जब निर्धारित सीमा से वजन बढ़ने के कारण उन्हें अयोग्य करार दिया गया था। विनेश ने कहा, बहुत कुछ कहने को है, लेकिन शब्द कम पड़ जाएंगे। शायद इस बारे में मैं फिर बोलूं जब मुझे लगेगा कि समय सही है। मैं बस यही कहना चाहती हूं कि छह अगस्त की रात और सात अगस्त की सुबह तक हमने अपने प्रयास बंद नहीं किए थे। हमने सरेंडर नहीं किया, लेकिन ये घड़ी थी जो बंद हो गई और समय काफी नहीं था। मेरी किस्मत भी ऐसी ही थी। मेरी टीम, मेरे साथी भारतीयों और मेरे परिवार को ऐसा लगता है कि जिस लक्ष्य के लिए हम काम कर रहे थे और जिसे हासिल करने की हमने योजना बनाई थी वह अधूरा है, कुछ न कुछ कमी हमेशा रह सकती है और चीजें फिर कभी पहले जैसी नहीं हो सकतीं।
पेरिस ओलंपिक 2024
- फोटो : अमर उजाला
'हालात अलग होते तो 2032 तक खेल सकती थी'
विनेश ने कहा, हो सकता है कि अलग-अलग परिस्थितियों में, मैं खुद को 2032 तक खेलते हुए देख सकूं, क्योंकि मेरे अंदर संघर्ष और कुश्ती हमेशा रहेगी। मैं भविष्यवाणी नहीं कर सकती कि भविष्य में मेरे लिए रखा है लेकिन मुझे इस यात्रा का इंतजार है। मुझे यकीन है कि मैं जिस चीज में विश्वास करती हूं और सही चीज के लिए हमेशा लड़ती रहूंगी।
अपने पिता की बातों को किया याद
विनेश ने एक्स अकाउंट पर पोस्ट कर लिखा, एक छोटे से गांव से आने वाली बच्ची होने के कारण मुझे ओलंपिक या इसके रिंग का मतलब नहीं पता था। जब मैं छोटी बच्ची थी तो मेरा सपना लंबे बाल रखना, हाथ में मोबाइल फोन रखना और हर वो काम करने का था जो आमतौर पर एक युवा लड़की का सपना होता है। मेरे पिता एक आम बस चालक थे और कहते थे कि एक दिन वह अपनी बेटी को प्लेन में उड़ते देखेंगे। उनका कहना था कि भले ही वह सड़क तक सीमित रहेस लेकिन मैं ही हूं जो अपने पिता के सपने को हकीकत में बदलूंगी। मैं यह कहना नहीं चाहती, लेकिन मुझे लगता है कि मैं उनकी पसंदीदा बच्ची थी क्योंकि मैं तीन बच्चों में सबसे छोटी थी। जब वह मुझसे यह सब कहते थे तो मैं हंसती थी।
उन्होंने कहा, मेरी मां जो अपने जीवन की कठिनाइयों पर एक पूरी कहानी लिख सकती थीं, उन्होंने केवल यह सपना देखा था कि उनके सभी बच्चे एक दिन उनसे बेहतर जीवन जिएंगे। स्वतंत्र होना और उनके बच्चों का अपने पैरों पर खड़ा होना उनके लिए एक सपना था। उनकी इच्छाएं और सपने मेरे पिता से कहीं अधिक सरल थे। लेकिन मेरे पिता हमें छोड़कर चले गए और मैं बस उनके विचार और प्लेन में उड़ान भरने की यादों के साथ रही। मैं तब उनके अर्थ को लेकर असमंजस में थी, लेकिन फिर भी उस सपने को अपने पास रखा। मेरी मां का सपना अब और दूर हो गया था क्योंकि मेरे पिता की मृत्यु के कुछ महीने बाद उन्हें स्टेज तीन कैंसर का पता चला था। यहां तीन बच्चों की यात्रा शुरू हुई जो अपनी अकेली मां का समर्थन करने के लिए अपना बचपन खो देते हैं। जल्द ही मेरे लंबे बाल, मोबाइल फोन के सपने धूमिल हो गए क्योंकि मैंने जीवन की वास्तविकता का सामना किया और अस्तित्व की दौड़ में शामिल हो गई। लेकिन संघर्ष ने मुझे काफी कुछ सिखाया। मेरी मां का संघर्ष, कभी हार ना मानने का व्यवहार और लड़ने की क्षमता, जैसी मैं आज हूं। उन्होंने मुझे उस चीज के लिए लड़ना सिखाया जो मेरा हक है। जब मैं साहस के बारे में सोचती हूं तो उनके बारे में सोचती हूं और यही साहस है जो मुझे परिणाम के बारे में सोचे बिना हर लड़ाई लड़ने में मदद करता है।
'पति सोमवीर ने हर कदम पर दिया साथ'
विनेश ने कहा, आगे की राह कठिन होने के बावजूद हमने एक परिवार के रूप में भगवान में अपना विश्वास कभी नहीं खोया और हमेशा भरोसा किया कि उन्होंने हमारे लिए सही चीजों की योजना बनाई है। मां हमेशा कहती थीं कि भगवान अच्छे लोगों के साथ कभी बुरा नहीं होने देंगे। मुझे इस पर तब और भी अधिक विश्वास हुआ जब मेरी मुलाकात सोमवीर से हुई, जो कि मेरे पति, जीवनसाथी और जीवन भर के लिए सबसे अच्छा दोस्त है। यह कहना कि जब हमने किसी चुनौती का सामना किया तो हम बराबर के भागीदार थे, गलत होगा, क्योंकि उन्होंने हर कदम पर बलिदान दिया और मेरी कठिनाइयों को उठाया, हमेशा मेरी रक्षा की। उन्होंने मेरी यात्रा को अपने सफर से ऊपर रखा और अत्यंत निष्ठा, समर्पण और ईमानदारी के साथ अपना सहयोग प्रदान किया। यदि वह नहीं होता, तो मैं यहां रहने, अपनी लड़ाई जारी रखने और प्रत्येक दिन का सामना करने की कल्पना नहीं कर सकती थी। यह केवल इसलिए संभव है क्योंकि मैं जानती हूं कि वह मेरे साथ खड़ा है, मेरे पीछे है और जरूरत पड़ने पर मेरे सामने खड़ा है और हमेशा मेरी रक्षा कर रहा है।
'पिछले दो साल में मेरे साथ काफी कुछ हुआ'
उन्होंने कहा, मेरी यात्रा ने मुझे बहुत सारे लोगों से मिलने का मौका दिया है, जिनमें से ज्यादातर अच्छे और कुछ बुरे हैं। पिछले डेढ़-दो साल में, मैट के अंदर और बाहर बहुत कुछ हुआ है। मेरी जिंदगी ने कई मोड़ लिए और ऐसा लगा जैसे उससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है। लेकिन मेरे आस-पास के जो लोग थे उनमें ईमानदारी थी, मेरे प्रति सद्भावना थी और व्यापक समर्थन था। ये लोग और उनके मुझ पर विश्वास इतना मजबूत था कि यह उन्हीं की वजह से है कि मैं आगे बढ़ी और पिछले दो वर्षों से इन चुनौतियां निपट सकी।
विनेश ने सहायक टीम और पारदीवाला का जताया आभार
विनेश ने अपने सहायक टीम के बारे में कहा, मैट पर मेरी यात्रा के दौरान पिछले दो साल से मेरे सहायक टीम ने काफी बड़ा योगदान दिया है। डॉ. दिनशॉ पारदीवाला, यह भारतीय खेलों में नया नाम नहीं है। मेरे लिए और मुझे लगता है कि कई अन्य भारतीय एथलीटों के लिए, वह सिर्फ एक डॉक्टर नहीं है, बल्कि भगवान द्वारा भेजे गए एक देवदूत हैं। जब चोटों का सामना करने के बाद मैंने खुद पर विश्वास करना बंद कर दिया था, तो यह उनका विश्वास, काम और मुझ पर भरोसा ही था जिसने मुझे फिर से अपने पैरों पर खड़ा कर दिया। अपने काम और भारतीय खेलों के प्रति उनका समर्पण और ईमानदारी ऐसी चीज है जिस पर भगवान को भी संदेह नहीं होगा। मैं उनके और उनकी पूरी टीम के काम और समर्पण के लिए हमेशा आभारी हूं। भारतीय दल के एक भाग के रूप में उनका पेरिस ओलंपिक में उपस्थित होना सभी साथी एथलीटों के लिए एक ईश्वरीय उपहार था।
गगन नारंग और ओलंपिक टीम के लिए क्या कहा?
विनेश ने कहा, मैं पहली बार गगन सर से मिली थी और एक एथलीट के प्रति उनकी दयालुता और सहानुभूति बिल्कुल वैसी ही थी जैसी खेलों जैसी उच्च दबाव वाली स्थिति में जरूरी होती है। मैं पूरी टीम के वास्तविक प्रयासों की सराहना करनी चाहता हूं जिन्होंने खेल गांव में भारतीय दल के लिए दिन-रात काम किया।
'ओलंपिक में तिरंगा लहराना चाहती थी'
पहलवानों के विरोध के दौरान मैं भारत में महिलाओं की पवित्रता, हमारे भारतीय ध्वज की पवित्रता और मूल्यों की रक्षा के लिए कड़ी मेहनत कर रही थी। लेकिन जब मैं 28 मई 2023 को भारतीय ध्वज के साथ अपनी तस्वीरें देखती हूं, तो यह मुझे परेशान कर देता है। मेरी इच्छा थी कि इस ओलंपिक में भारतीय ध्वज लहराए। मेरे पास भारतीय ध्वज की एक तस्वीर हो जो वास्तव में इसके मूल्य का प्रतिनिधित्व करती हो। मुझे लगा कि ऐसा करने से पता चलेगा कि यह तिरंगा और कुश्ती किन चीजों से गुजरी है। मैं वाकई अपने साथी भारतीयों को यह दिखाने की उम्मीद कर रही थी।