दोनों के मुताबिक उस वक्त चुनौती यह थी कि किसी तरह 1960 के रोम ओलंपिक में पाकिस्तान के हाथ से निकले स्वर्ण पदक को वापस पाना है। वहां उन्होंने पाकिस्तान से स्वर्ण छीना था और यहां टोक्यो में मनप्रीत की टीम ने भारतीय हॉकी को नया जीवन दिया। गुरबख्श को याद है कि 1964 ओलंपिक का फाइनल भारतीय टीम की प्रतिष्ठा की बात बन गया था। मोहिंदर लाल के पेनाल्टी स्ट्रोक पर भारत ने पाक को जैसे ही 1-0 से हराया। स्टेडियम में मौजूद मिल्खा सिंह, जीएस रंधावा, अश्वनी कुमार, राजा कर्णी सिंह सभी मैदान में घुस आए और टीम के सदस्यों को गले लगाना शुरू कर दिया। हरबिंदर कहते हैं कि रोम में पाकिस्तान से मिली फाइनल में हार काफी चुभने वाली थी। भारतीय टीम किसी भी कीमत पर स्वर्ण पदक वापस पाना चाहती थी और उन्होंने ऐसा करके भी दिखाया।
गुरबख्श बताते हैं कि 5-4 के स्कोर पर अंतिम क्षणों का रोमांच वह बरदाश्त नहीं कर पा रहे थे, लेकिन किसी तरह उन्होंने अपने को टीवी के आगे उठने नहीं दिया। यह जीत बहुत बड़ी है। उस दौरान उन्होंने टोक्यो में पाकिस्तान से स्वर्ण छीना था और आज का पदक हॉकी की लोकप्रियता को फिर बहाल कर देगा। हरबिंदर के मुताबिक इस पदक के अलग मायने निकलेंगे। भारतीय हॉकी को यही चाहिए था। जितने भावुक वह 64 का स्वर्ण जीतने पर थे उतने ही भावुक वह आज के पदक जीतने से हैं।