दुनिया भर में 'हॉकी के जादूगर' के नाम से मशहूर भारत के महान हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद को बचपन में हॉकी के प्रति कोई खास लगाव नहीं था। 16 साल की उम्र में सेना में भर्ती होने के बाद उन्होंने हॉकी खेलना शुरु किया। ध्यानचंद को हॉकी खेलने के लिए प्रेरित रेजीमेंट के एक सूबेदार ने किया। दद्दा उन्हीं के देखरेख में आगे चलकर हॉकी के इतिहास के सबसे महान खिलाड़ी बने।
वैसे तो हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद से जुड़े ऐसे कई किस्से हैं जो हॉकी के चाहने वालों के जेहन में हमेशा बसे रहेंगे। फिर चाहे वो हिटलर का ध्यानचंद को जर्मनी से खेलने का ऑफर और सेना में भर्ती का हो, या फिर उनकी स्टिक पर चुंबक लगे होने के शक में हॉकी स्टिक को हालैंड के मैदान पर ही तुड़वा कर उसकी जांच करना हो।
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उसी तरह दद्दा से जुड़ा एक और ऐसा किस्सा है जिसे कम ही लोग जानते हैं। दरअसल ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना के स्पोर्ट्स क्लब में मेजर ध्यानचंद की एक मूर्ति लगाई गई। इस मूर्ति की खास बात ये है कि इसमें मेजर ध्यानचंद के चार हाथ बनाए गए हैं। मूर्ती में उनके चारों हाथ में स्टिक थमाई गई है। वाकई इस मूर्ति से पता चलता है कि हॉकी जगत में दद्दा का इतना दबदबा था कि उनको खेलते देखकर यही लगता था कि, मानो उनके दो नहीं चार-चार हाथ हों, और दद्दा चारों हाथों से स्टिक थामकर गोल बरसा रहे हों।
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मालूम हो कि ध्यानचंद ने 1928 एम्सटर्ड ओलंपिक, 1932 लॉस एंजेल्स ओलंपिक और 1936 बर्लिन ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। तीनों ही बार भारत ने ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीता। एम्सटर्ड और एंजेल्स ओलंपिक में दद्दा टीम के सदस्य खिलाड़ी के तौर पर शामिल थे। जबकि बर्लिन ओलंपिक में उन्होंने कप्तान के रूप में टीम का नेतृत्व किया और गोल्ड मेडल जीता। ध्यानचंद के इस दमदार प्रदर्शन के चलते उस दौर को भारतीय हॉकी जगत का सुनहरा दौर कहा जाता था।
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