मेजर ध्यानचंद के बाद हॉकी के जिस कलाकार ने उनकी परंपरा को आगे बढ़ाया वह थे बलबीर सिंह दोसांझ। यह भी एक सुखद संयोग है कि भारतीय हॉकी टीम के लिए जो चार बलबीर थे उनमें बलबीर दोसांझ ही सबसे बड़े थे। बलबीर सिंह सीनियर एक कामयाब ओलंपियन होने के साथ कामयाब हॉकी कोच और मैनेजर भी रहे।
कुछ लोग भारतीय हॉकी के सुनहरे दौर के साक्षी नायकों में तुलना करने की भूल करते हैं। यह वाजिब नहीं है। इस बात में बहस की कोई गुंजाइश ही नहीं है कि ध्यानचंद दुनिया में हॉकी पर्याय हैं। दुनिया में आज भी भारतीय हॉकी की चर्चा ‘ध्यानचंद’ के हॉकी देश के रूप में होती है। ध्यानचंद दुनिया में हॉकी का उसी तरह पर्याय हैं, जिस तरह क्रिकेट में डॉन ब्रैडमैन और फुटबॉल में पेले हैं।
बलबीर सिंह सीनियर जब 12 बरस के थे 1936 के बर्लिन ओलंपिक में हॉकी फाइनल की न्यूजरील में पहली बार ध्यानचंद का खेल देखा उनके ऐसे मुरीद हो गए कि उन्हें ही अपना आदर्श के रूप में देखने लगे थे। तभी बलबीर साहब ने यह ठान लिया वे हॉकी में वे कोशिश करेंगे कि ध्यानचंद की तरह की कामयाबी हासिल करें।
दिग्गज बलबीर सिंह के निधन को पाकिस्तान हॉकी समुदाय ने भी इसे उपमहाद्वीप में खेल के बड़े नुकसान के रूप में बयां किया है। पाकिस्तान के पूर्व कप्तान समीउल्लाह ने कहा कि उनके पास गजब की लोच, गति और कौशल था। जब वह गेंद लेकर बढ़ते तो देखते ही बनता था। उनके असाधारण खेल के कारण ही भारत ने लगातार तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक जीते थे। पाक हॉकी संघ के महासचिव आसिफ बाजवा ने शोक प्रकट करते हुए कहा कि वह दिग्गजों में से एक थे।
उन्होंने कहा कि मैंने उन्हें खेलते तो नहीं देखा लेकिन उनके बारे में सीनियरों से सुना बहुत है कि अलग ही स्ट्राइकर थे। पूर्व कप्तान हसन सरदार ने कहा कि उनके किस्से सुनकर उन्हें बड़ी प्रेरणा मिली थी। पूर्व खिलाड़ी इस्लाहुद्दीन सिद्दिकी ने कहा, वह बेहद मृदृभाषी और मिलनसार थे। हॉकी की उन्हें गहरी समझ थी। वह अपने अनुभव को साझा करने में हिचकिचाते नहीं थे। जब भारत ने 1975 विश्व कप में भारत ने पाकिस्तान को हराया तब वहीं भारतीय टीम के मैनेजर थे।