सत्य की खोज में एक ही संघर्ष है। और वह संघर्ष है विचारों से मुक्ति। कैसे तुम विचार के बाहर जाओ-सारी विधियां, सारी साधनाएं, बस, उस छोटे से कदम के लिए हैं-विचार की प्रक्रिया कैसे बंद हो जाए। क्योंकि जैसे ही विचार रुकता है, वैसे ही आंख खुलती है।
जैसे ही विचार रुकता है, वैसे ही तुम देखने में समर्थ हो पाते हो। जब तक विचार है तब तक आंख धुंध से भरी है। जैसे दर्पण पर धूल जमी हो ऐसी चेतना पर विचार की पर्तें जमी हैं। बहुत उपाय किए गए हैं कि किस तरह तुम्हें विचारों के घेरे से बाहर लाया जाए है। विचारों से निकलने की एक विधि है ‘कोआन’।
इसका अर्थ है ऐसी पहेली, जो हल नही की जा सके। और जिसे सोचते-सोचते-सोचते सोचना ही थक जाए। और तुम इतने ऊब जाओ सोचने से, इतने परेशान हो जाओ, सोचना इतना व्यर्थ मालूम पड़े कि तुम सोचना ही छोड़ दो। आसान नहीं है। क्योंकि बुद्धि जल्दी नहीं थकती। विपरीत स्थिति में भी सोचे चली जाती है।
मैंने सुना है, मुल्ला नसरुद्दीन ने अपने एक मित्र को सड़क पर जाते देखा; पीठ की तरफ से। तेजी से कदम बढ़ाए, जाकर उसकी पीठ ठोंकी और कहा, ‘कहां खो गये थे अब्दुल। वर्षों बाद दिखाई पड़े।’ उस आदमी ने पलटकर, चौंककर देखा। मुल्ला नसरुद्दीन ने भी उसे चौंककर देखा और कहा, ‘हद्द हो गई! कौन सी विपत्ति आई तुम पर? पिछली बार जब मिले थे तो ठिगने थे, मोटे थे और अब अचानक लंबे और दुबले हो गये। चेहरा भी बिलकुल बदल डाला। दाढ़ी-मूंछ कब बढ़ा ली?’
उस आदमी ने कहा कि माफ करें, आप किसी और की भूल में होंगे। मेरा नाम अब्दुल्ला नहीं है। नसरुद्दीन ने दुबारा उसकी पीठ ठोंकी और कहा, ‘प्यारे, तो नाम भी बदल दिया!’ ऐसा विचार है। वह अपने लिए तर्क खोजता ही चला जाता है। वह अपने लिए मार्ग खोजता ही चला जाता है।
तथ्य को अस्वीकार करना आसान है, भीतर की प्रक्रिया को अस्वीकार करना मुश्किल है। और करीब-करीब विचार ऐसा है, जैसा ग्रामोफोन का रिकार्ड खराब हो गया हो, और एक ही बात को दुहराता चला जाए। विचार यांत्रिक है, बार-बार मन में उठता है। और तुम वही-वही दुहराए चले जाते हो।
अगर तुम गौर से अपने विचार को देखोगे तो एक बात समझ में आ जाएगी कि बहुत ज्यादा विचार नहीं है तुम्हारे भीतर। कुछ विचार हैं जो बार-बार मन में उठते हैं। एक लीक बन गई है। उसी लीक पर मन घूमता रहता है, वहीं सूई अटक गई है और रिकार्ड की तरह बार-बार बजती रहती है। मैंने सुना है कि पहला हवाई जहाज, जो पूर्ण रूप से स्वचालित था, बना। उसमें पायलट की कोई जरूरत न थी।
उसमें परिचारिकाओं की कोई जरूरत नहीं थी। बटन दबाओ, चाय आए; बटन दबाओ, भोजन आए। कोई भी व्यक्ति वहां न था; पूरी तरह स्वचालित था, आटोमैटिक था। जैसे ही हवाई जहाज उड़ा, सूचना आनी शुरू हुई कि यह हवाई जहाज पूरी तरह स्वचालित है; यह पहला हवाई जहाज है। लाल रंग की बटन दबाएं, चाय, पानी, नाश्ता; पीले रंग की बटन दबाएं, भोजन। हरे रंग की बटन दबाएं तो सब जरूरतें। और कोई पायलट नहीं है।
यह स्वचालित हवाई जहाज अपने गंतव्य पर पहुंचकर उतर जाएगा। आप बिलकुल चिंता न करें। घबड़ाने की कोई भी जरूरत नहीं है, क्योंकि सभी तरह की सावधानी बरती गई है। यंत्र में कोई भी भूल नहीं है-यंत्र में कहीं भी कोई भूल नहीं है-यंत्र में कहीं भी कोई भूल नहीं है... और इस लाईन पर बात अटक गई।
सोच सकते हैं उस हवाई जहाज के यात्रियों की हालत! भूल तो साफ है। और जब यह भूल हो सकती है, तो कोई भी भूल हो सकती है।
साभार ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन, नई दिल्ली