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गुरू बनाने से पहले गुरू को जानें: दाती जी महाराज

Mon, 01 Apr 2013 12:51 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
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मनुष्य के अंदर सुख का खजाना है, किंतु सबको उसकी जानकारी नहीं है। यदि बौद्धिक स्तर पर किसी को कुछ जानकारी है भी तो, व्यावहारिक रूप में उसे वह नहीं मिल पा रहा है।
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किंतु, स्वभावत: ही वह अंदर से उसे पाने का प्रयास करने की प्रेरणा प्राप्त कर रहा है। अंतरतम में जाने के लिए उसे एक कुशल गुरु चाहिए, किंतु सफल मार्गदर्शक खोजने में बराबर भूल होती रहती है।

क्योंकि मनुष्य शब्दों के बाह्य आडंबरों में फंसकर यह विचार नहीं करता कि गुरु बनने का दावा करने वाले व्यक्ति में मात्र सैद्धांतिक वाक्-पटुता है या वह क्रियात्मक रूप से हमारे अंतरतम में छिपे सुख-शांति के अपरिमित खजाने तक पहुंचने की विधि बताने की घोषणा भी करता है।
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सच्चे मार्गदर्शक के स्थान पर झूठे और भुलावा देने वाले मार्गदर्शकों का चुनाव होता रहता है। यही कारण है कि उसको अंदर से तो प्रेरणा होती है कि वह सुख प्राप्त करें, किंतु दु:ख ही मिलता है।

सच्चे मार्गदर्शक की खोज करना अति आवश्यक है क्योंकि उसके बिना जीवन अधूरा और सूना-सूना रहता है, हृदय में शाश्वत सुख का अभाव सदैव खटकता रहता है।

दूसरे शब्दों में सच्चे मार्गदर्शक की खोज करना, जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति करना है। परंतु सच्चे मार्गदर्शक कहां मिले, हम किस पर विश्वास करें, यह भी एक समस्या है।

यदि कोई रोगी किसी डाक्टर के पास जाकर रोगमुक्त होता है तो वह उसी के गुण गाता है। उस रोगमुक्त व्यक्ति के संपर्क में आया हुआ दूसरा रोगी व्यक्ति भी उसी डाक्टर के पास जाने का प्रयास करता है और अगर वह भी रोगमुक्त हो जाता है तो डाक्टर पर लोगों का विश्वास जम जाता है। स्पष्ट है, व्यक्तिगत संपर्क में जाकर उसके द्वारा बतायी गयी औषधि का उपयोग करके ही कोई रोगी डाक्टर की योग्यता का आकलन कर सकता है।

एक रोगी के लिए डाक्टर की परीक्षा की यही कसौटी होती है। उसी प्रकार जिसकी कृपा से अपने ही अंतरतम में स्थित शाश्वत सुख की खान से व्यावहारिक रुप से पहुंचने में सहायता मिलती है।

उसी समय के तत्वदर्शी सद्गुरु की शरण लेने पर ही ऐसा संभव हो सकता है। अपने आपसे कैसे जुडऩा है, कैसे अपने आप का परिचय प्राप्त करना है, इसकी प्रक्रिया सच्चे जिज्ञासुओं को सद्गुरु द्वारा प्रदान की जा सकती है।
साभारः परमहंस दाती जी महाराज

दाती जी महाराज परिचय
दाती जी महाराज का जन्म 10 जुलाई 1950 को राजस्थान के पाली जिला में अलावास गांव में हुआ। दाती जी महाराज बचपन से ही तीक्ष्ण बुद्घि के स्वामी थे। बाल्यकाल में ही इनका लगाव ईश्वर से हो गया था। इन्होंने संसार में व्याप्त ज्योतिष, ध्यान और शनि संबंधित भ्रांतियों को दूर करने का विचार किया। इनकी विद्या, ज्ञान और कृपा से बहुत से भक्त लाभ प्राप्त कर रहे हैं। दाती जी के तीन प्रमुख सिद्घांत हैं सेवा, सतसंग और सुमिरन।
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