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क्या सचमुच प्रार्थना असर करती है

Fri, 29 Nov 2013 01:59 PM IST
परमहंस सत्यानंद सरस्वती
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सचमुच प्रार्थना में कोई शक्ति है भी या वह केवल आत्मसंतोष के लिए की जाती है? यह प्रश्न कभी-कभी आपके भी मन में उठता होगा। प्रार्थना बेकार कभी नहीं होती। क्रिया और प्रतिक्रिया सृष्टि का नियम है। विचारों में भी कंपन पैदा होते हैं और उनका असर होता है।
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संक्षेप में तो यह कहा जा सकता है कि प्रार्थना में अपार चमत्कार-शक्ति है। किंतु इतने से पढऩे वाले पाठकों को संतोष नहीं होगा। सत्य सीधा सरल संक्षिप्त और अनन्त शक्ति का स्रोत है, परंतु लोगों को सत्य उतना नहीं आकर्षित करता जितना आडंबर। लोगों को पठनीय सामग्री चाहिए।
 
नित्य प्रार्थना करो, कहना उनके लिए काफी नहीं होगा। क्यों करें? यह होगा उनका पहला प्रश्न। दूसरा प्रश्न- प्रमाण क्या है? क्या फायदा हमें मिलेगा? तीसरा प्रश्न- किस तरह कब और क्या प्रार्थना करें। यद्यपि सभी प्रश्न बेमानी हैं।
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असल बात यह है कि प्रार्थना समझने और जानने की चीज नहीं है, वह आत्मा की शक्तियों को जगाने का एक माध्यम है। अंतिम सत्य तो केवल यही है कि ईश्वर की स्थिति हमारे अंदर ही है। मंत्र योग, जपयोग, लययोग इत्यादि की तरह ही प्रार्थना भी एक योग है जिसका उद्देश्य है अपने को ईश्वरीय शक्ति के साथ संयुक्त करना।

बहुत से लोगों के जीवन में ऐसा भी होता है कि उनकी प्रार्थनाएं निष्फल ही जाती हैं। इसमें उनमें अविश्वास, संदेह और निराशा का जन्म होता है। इसका कारण क्या है। कई ऐसे भी उदाहरण पाए जाते हैं जिनमें प्रार्थनाओं का असर होता तो पार देर से होता है।

ऐसा भी क्यों? उत्तर  यह है कि हमारी प्रार्थना की शक्ति हमारी अन्य वासनाओं बिखरे हुए विचारों, अनेक मानसिक विक्षेपों के कारण क्षीण हो जाती है।  सबसे बड़ी बात जो प्रार्थनाओं को निष्फल करती है, वह है प्रार्थना करने वालों के अपने ही विरोधी विचार।

प्रार्थना की विधि अत्यंत मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक वस्तु है। अपने मन के अशुभ और अनर्गल विचारों को निकाल फेंकने में प्रार्थनाओं से बढ़कर प्रभावशाली सरल पद्धति दूसरी नहीं है। तन्मय होकर, बेसुध होकर, भाव में बहकर, दिल की संपूर्ण सच्चाई से एक बार तुम ईश्वर अपने इष्ट से प्रार्थना करो और देखो। ईश्वर सुने या न सुने यह पीछे की बात। किंतु तुम्हारा दिल हल्का हो गया कि नहीं, यह पहले देखो। तुम्हारे दिल पर रखा पत्थर हट गया कि नहीं, यह देखो।

तुम्हारे मानसिक तनाव कम हो गए या नहीं, यह देखो और अंत में तुमको यह भी मानना पड़ेगा कि ईश्वर भी तुम्हारी पुकार उसी मात्रा में सुन लेता है जितना मात्रा में तुम्हारी आकुल पुकार और सच्ची प्रार्थना होती है। प्रार्थना में दो व्यक्तित्व होते हैं। इष्ट और साधक, भगवान और भक्त ये दो अलग धारणाएं होती हैं। इन दोनों में यद्यपि आत्मीयता और अटूट एकता का भी भाव रहता है तो भी भक्त अपनी सोचने और अनुभव करने की शक्ति को ईष्ट की सर्वव्यापी शक्ति से अलग मानता है।

उस सर्वव्यापी शक्ति की एक किरण, एक झलक पाने के लिए प्रार्थना को आधार बनाती है। ध्यान योगी ऐसा नहीं करते। वे अपने इष्ट की मूर्ति का निर्माण अपने मनस तत्वों से करते हैं जो बाद में प्राणमय होकर प्रकट होती है।
प्रार्थना एक उच्च साधना की क्रिया तो है ही किंतु साथ-साथ प्रार्थना का मनोवैज्ञानिक महत्व भी है। जिस तरह ध्यान क्रिया मानसिक तनावों को शांत करने की प्रणाली के रूप में स्वीकृत होती है।

नित्य भाव से प्रार्थना करने से मानसिक श्रम तथा सुख-दुख, असफलता, निराशा और द्वंद्व इत्यादि से उत्पन्न आघातों के प्रभाव दूर होते हैं और स्नायुओं में फिर से शक्ति भर जाती है। प्रार्थना करने के बाद फलाफल की इच्छा त्याग देनी चाहिए। फलित हो तो भी ठीक, न हो तो भी ठीक।

यह स्थिति भी उतनी ही ठीक है जितनी फलित होने पर ठीक होती। यही भाव लेकर प्रार्थना होनी चाहिए। यदि मनोनुकूल फल न भी हो तो समझना चाहिए कि इसमें भी कुछ रहस्य है और तुम्हारे कुछ कल्याण के लिए देव ने ऐसा नहीं होने दिया और अनुभवों से ऐसा ही पता चलता है। बाद की घटनाएं और जीवन का मोड़ यही सिद्ध करता है।
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