शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात्परं सुखम्।
न तृष्णायाः परो व्याधिर्न च धर्मो दयापरः ।।
आचार्य चाणक्य के इस श्लोक का अर्थ है कि शांति से बड़ा कोई तप नहीं, और संतोष से बढ़कर कोई सुख नहीं होता है। ऐसा माना जाता है कि व्यक्ति को शांत रहने के लिए हमेशा अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखना चाहिए। हर समय कामना करने वाले लोगों को सुख नहीं मिल सकता। आचार्य चाणक्य का मानना है कि मनुष्य की तृष्णा उस रोग की तरह होती है, जिसमें भूख कभी शांत नहीं होती। वहीं उन्होंने दया को सर्वश्रेष्ठ धर्म माना है।
मनसा चिन्तितं कार्यं वाचा नैव प्रकाशयेत्।
मन्त्रेण रक्षयेद् गूढं कार्ये चाऽपि नियोजयेत् ।।
इस श्लोक का अर्थ है कि मन में सोचे हुए काम को कभी भी वाणी द्वारा प्रकट नहीं करना चाहिए। हमेशा मन में रखकर उस कार्य को पूरा करने की नीति पर काम करना चाहिए। आचार्य चाणक्य के अनुसार जीवन में खुश रहने के लिए कभी भी किसी व्यक्ति को मन का भेद नहीं देना चाहिए। आप को जो भी काम करना है, उसे हमेशा मन में रखें। कई बार कुछ लोग अपने लक्ष्य को सबके सामने उजागर कर देते हैं, फिर उसके पूरा न होने पर तनाव होने लगता है। साथ ही समाज में उसकी हंसी भी होती हैं। इससे व्यक्ति का विश्वास भी कम होता है। इसलिए अपनी योजनाओं को हमेशा मन में रखकर कार्य करना चाहिए।
परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम् ।
वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम् ।।
चाणक्य के इस श्लोक का अर्थ है कि जो लोग पीठ पीछे काम को बिगाड़ते है, और मुंह पर मीठी-मीठी बातें करते हैं, उनसे कभी मित्रता नहीं रखनी चाहिए। आचार्य चाणक्य के अनुसार जीवन में कभी भी ऐसे लोगों से दोस्ती नहीं रखनी चाहिए, जो चिकनी-चुपड़ी बातें बनाते हो। ऐसे लोग आपकी सफलता में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं। चाणक्य कहते हैं कि ऐसे दोस्त उस बर्तन के समान है, जिसके ऊपर के हिस्से में दूध होता है, लेकिन अंदर विष है।
आचार्य चाणक्य द्वारा दिए गए यह सूत्र संपूर्ण 'चाणक्य नीति, चाणक्य सूत्र और जीवन गाथा' मनोज पब्लिकेशन के लेखक द्वारा संपादित पुस्तक से लिए गए हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेख लोक मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।