सन 1929 में जब वह कुल साढ़े तीन वर्ष की थीं, तो उनकी रीढ़ की हड्डी में दर्द हुआ। इलाज भी कराया गया, लेकिन रोग ठीक होने की बजाय गंभीर होता गया। चौदह वर्ष की होने तक पीड़ा असहनीय हो चुकी थी और वह चलने-फिरने में असमर्थ हो गई। एलिजाबेथ पूरे 35 साल तक यह पीड़ा झेलती रहीं। चिकित्सकों ने हार मान ली और उसके मर्ज को लाइलाज बताया। सन 1960 में एलिजाबेथ के अभिभावकों को कहीं से डॉ. हैरी एडवर्ड्स के बारे में पता चला। वे एलिजाबेथ को उनके पास ले गए। आश्चर्य की बात यह थी कि कुछ हफ्तों के आध्यात्मिक उपचार से वह ठीक हो गईं। डॉ. हैरी एडवर्ड्स ने अपनी इस चिकित्सा पद्धति के बारे में अपनी पुस्तक “ट्रुथ अबाउट स्पिरीचुअल हीलिंग” में लिखा कि यह चिकित्सा पद्धति पौर्वात्य दर्शन की दी हुई एक विधि है और इसका परिणाम तर्कसंगत है। अपनी बात को तर्क और तथ्य से समझाते हुए उन्होंने कहा कि नारंगी अच्छी होती है।
यदि ऐसा नहीं होता, तो उसके उगने और विकसित होने का कोई मतलब नहीं था। लेकिन पेड़ से तोड़ने के बाद नारंगी खराब निकलती है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उसके उगने का उद्देश्य गलत था। खराब नारंगी एक बीमार नारंगी है और इसके लिए नारंगी दोषी नहीं है। दोष या तो किसी शुरुआती कारण से होता है अथवा कोई बाहरी कारण से। हो सकता है नारंगी को टहनी से जोड़ने वाली डंडी कमजोर हो। इससे नारंगी गिर सकती है और गिर कर खराब हो सकती है या फिर बीमारी का कारण भी बाहरी हो सकता है। वजह जो भी हो, उसे दूर किया जा सकता है, उसका उपचार किया जा सकता है। उसी तरह आदमी भी भीतरी कमजोरी या बाहरी आक्रमण का शिकार हो सकता है।
जिस तरह वृक्ष के पोषण के साथ नारंगी की टहनी से जोड़ने वाली कड़ी भी मजबूत होना जरूरी है, उसी तरह उस कड़ी को भी मजबूत बनाना जरूरी है, जो मनुष्य को उसके उद्गम से जोड़ती है। स्वास्थ्य का अर्थ है सामान्य प्राकृतिक स्थिति। बीमारी का अर्थ है स्थिति सहज नहीं है और उसे सामान्य बनाने की जरूरत है। यह काम आध्यात्मिक चिकित्सा से हो सकता है तथा होना चाहिए। चिकित्सा का उद्देश्य इतना ही रहे कि मनुष्य का संबंध अन्तःकरण से जुड़ जाए। आध्यात्मिक चिकित्सा का काम मनुष्य और उसके सर्जक के संबंधों को फिर स्थापित करना है।