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बीमारी से रहना चाहते हैं दूर तो श्रीकृष्ण के बताए इस रास्ते पर चलें

Sat, 06 Jan 2018 09:12 AM IST
स्वामी योगत्रयानंद सरस्वती
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गीता में शरीर को रथ की उपमा देते हुए कहा गया है कि इन्द्रियां इसके घोड़े हैं, मन सारथी और आत्मा स्वामी है। शरीर और मन का संबंध शासित और शासक जैसा है। शरीर वही कुछ करता है, जिसका मन निर्देश देता है। मन जिधर लगाम खींचता है, शरीर रथ के घोड़े उसी दिशा की ओर दौड़ पड़ते हैं। ऐसा कोई शारीरिक क्रियाकलाप नहीं, जो मन की इच्छा के विपरीत होता हो। जिसकी आज्ञा के बिना कोई काम न हो, उसे मालिक नहीं, तो और क्या कहेंगे? शरीर में ऐसा कोई अंग अवयव नहीं, जो मन की उपेक्षा कर सके। मन से बलवान आत्मा है, इससे ज्यादा ताकतवर शरीर में कोई नहीं। यह जानने के बाद इंकार का कोई कारण नहीं कि मन का संतुलन शोक, रोग, बीमारियों के रूप में भी प्रभावित करता है। विज्ञान भी अब मानने लगा है।

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कनाडा के शरीर शास्त्री और मनोविज्ञानी डॉ. डैनियल कापोने के अनुसार, साधारण सा जुकाम केवल मानसिक कारणों से होता है। वह कहते हैं कि जुकाम का निमित्त कारण विषाणु हो सकता है, पर उनकी प्रकृति अन्य विषाणुओं से अलग होती है। चेचक, खसरा, डेंगू, चिकनगुनिया आदि रोग एक बार होते हैं, तो शरीर में उनसे लड़ने की शक्ति आ जाती है। ठीक होने के बाद इन रोगों के दोबारा होने का खतरा लगभग नहीं रहता। लेकिन सर्दी-जुकाम पर यह बात लागू नहीं होती। वह कई बार होता और लगातार बना रहता है। जब तक मानसिक तनाव कम नहीं होता, वह काबू में आता भी नहीं। चाहे कितनी ही एंटीबायोटिक, एंटी-एलर्जिक दवा ली जा रही हों। वैसे तो दवाओं से यह जल्द ठीक हो जाता है, लेकिन फिर नहीं होगा इसकी कोई गारंटी नहीं। मन बहलाने के लिए चाहे जितनी दवाएं ली जाती रहें, लेकिन सही बात यह है कि रोग की कोई दवा नहीं होती, क्योंकि कारण कहीं और है, चिकित्सा कहीं और की हो रही है।

चिकित्सा-विज्ञान ने भी यह मान लिया है कि दवा से नहीं मन पर नियंत्रण कर बीमारी को दूर किया जा सकता है। करीब पचास साल पहले ब्रिटेन के डॉ. हैरी एडवर्ड्स ने तो बिना दवा और बिना सर्जरी के एक नई चिकित्सा पद्धति विकसित की थी, जिसे उन्होंने 'स्पिरीचुअल हीलिंग' (आध्यात्मिक चिकित्सा) कहा था। डॉ. हैरी एडवर्ड्स ने अपनी पुस्तक “ट्रूथ अबाउट स्पिरीचुअल हीलिंग” में इस पद्धति के सिद्धांतो और विधियों का उल्लेख करते हुए ऐसे रोगियों के ब्यौरे दिए हैं, जिन्हें डाॅक्टर्स ने लाइलाज करार दिया था। इन रोगियों को डॉ. हैरी एडवर्ड्स ने अपनी चिकित्सा विधि से ठीक कर दिया। लंदन की एक महिला एलिजाबेथ विल्सन की रोग गाथा और उससे मुक्त होने की कथा बड़ी विचित्र है।

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सन 1929 में जब वह कुल साढ़े तीन वर्ष की थीं, तो उनकी रीढ़ की हड्डी में दर्द हुआ। इलाज भी कराया गया, लेकिन रोग ठीक होने की बजाय गंभीर होता गया। चौदह वर्ष की होने तक पीड़ा असहनीय हो चुकी थी और वह चलने-फिरने में असमर्थ हो गई। एलिजाबेथ पूरे 35 साल तक यह पीड़ा झेलती रहीं। चिकित्सकों ने हार मान ली और उसके मर्ज को लाइलाज बताया। सन 1960 में एलिजाबेथ के अभिभावकों को कहीं से डॉ. हैरी एडवर्ड्स के बारे में पता चला। वे एलिजाबेथ को उनके पास ले गए। आश्चर्य की बात यह थी कि कुछ हफ्तों के आध्यात्मिक उपचार से वह ठीक हो गईं। डॉ. हैरी एडवर्ड्स ने अपनी इस चिकित्सा पद्धति के बारे में अपनी पुस्तक “ट्रुथ अबाउट स्पिरीचुअल हीलिंग” में लिखा कि यह चिकित्सा पद्धति पौर्वात्य दर्शन की दी हुई एक विधि है और इसका परिणाम तर्कसंगत है। अपनी बात को तर्क और तथ्य से समझाते हुए उन्होंने कहा कि नारंगी अच्छी होती है।

यदि ऐसा नहीं होता, तो उसके उगने और विकसित होने का कोई मतलब नहीं था। लेकिन पेड़ से तोड़ने के बाद नारंगी खराब निकलती है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उसके उगने का उद्देश्य गलत था। खराब नारंगी एक बीमार नारंगी है और इसके लिए नारंगी दोषी नहीं है। दोष या तो किसी शुरुआती कारण से होता है अथवा कोई बाहरी कारण से। हो सकता है नारंगी को टहनी से जोड़ने वाली डंडी कमजोर हो। इससे नारंगी गिर सकती है और गिर कर खराब हो सकती है या फिर बीमारी का कारण भी बाहरी हो सकता है। वजह जो भी हो, उसे दूर किया जा सकता है, उसका उपचार किया जा सकता है। उसी तरह आदमी भी भीतरी कमजोरी या बाहरी आक्रमण का शिकार हो सकता है।

जिस तरह वृक्ष के पोषण के साथ नारंगी की टहनी से जोड़ने वाली कड़ी भी मजबूत होना जरूरी है, उसी तरह उस कड़ी को भी मजबूत बनाना जरूरी है, जो मनुष्य को उसके उद्गम से जोड़ती है। स्वास्थ्य का अर्थ है सामान्य प्राकृतिक स्थिति। बीमारी का अर्थ है स्थिति सहज नहीं है और उसे सामान्य बनाने की जरूरत है। यह काम आध्यात्मिक चिकित्सा से हो सकता है तथा होना चाहिए। चिकित्सा का उद्देश्य इतना ही रहे कि मनुष्य का संबंध अन्तःकरण से जुड़ जाए। आध्यात्मिक चिकित्सा का काम मनुष्य और उसके सर्जक के संबंधों को फिर स्थापित करना है।
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